| अकेलापन |
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| Written by श्री मिकाएल सोना | |||
| Tuesday, 12 September 2006 16:45 | |||
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हम कभी-कभी अपने को बहुत अकेला पाते हैं। कभी हम सोचते हैं कि हमें, हमारे परिवार के लोग या दोस्त ठीक से नहीं समझते। अकेलापन घबराहट पैदा करता है। सही मायनों में हम अकेले नहीं हैं परमेश्वर सदा हमारे साथ है। अकेलापन अकेलापन आज एक तेज़ी से फैलती समस्या है। बच्चे, जवान, वृद्ध, गरीब, अमीर, शिक्षित, अशिक्षित, नारी, पुरूष, सब अकेलापन महसूस करने लगे हैं। दुनिया तेज़ी से आधुनिकता को अपनाती जा रही है। जीवन का सुविधा सम्पन्न बनाने हेतु आधुनिकतम तकनीक का विकास हो रहा है। मनोरंजन के समस्त साधन विद्यमान हैं। इसके बावजूद भी अकेलापन कम होने के बजाय दिनों-दिन बढ़ता ही जा रहा है। मिकाएल प्रेमदास सोना 1. अच्छे मित्रों की कमीः- यह तरूणों एवं नवयुवतियों तथा प्रत्येक आयु के अविवाहितों के लिए सत्य है कि उन्हें अकेलेपन का शिकार होना पड़ता है। अपने सबसे अच्छे मित्र/सहेली से संबंध टूट जाने के कारण तरूण अकेलापन महसूस करते हैं। वे चाहे हज़ारों की संख्या में सहपाठियों के मध्य प्रतिदिन क्यों न रहते हों, उन्हें अकेलेपन का अवश्य अनुभव होता है क्योंकि उनका कोई अच्छा या गहरा मित्र नहीं रह जाता। किसी मध्य-आयु के अविवाहित पुरूष अथवा अविवाहित युवती का कोई भी गहरा मित्र नहीं होता, यहां तक कि कलीसिया में भी नहीं। सब उससे केवल ‘‘फॉरमेलिटी’’ निभाते हैं। वह भले ही अनेक वर्षों से कलीसिया में आता या आती हो फिर भी कोई भी पुरूष या महिला उसके घर जाना पंसद नहीं करती। प्रत्येक रविवार की आराधना सभा हो, प्रार्थना सभा हो अथवा मध्य सप्ताह की कॉटेज माटिंग। भले ही वह लोगों से घिरा या घिरी हो तथापि वह वास्तव में अकेला महसूस करता/करती है। 2. मृत्यु अथवा तलाकः- अनेक लोगों ने यह स्वीकारा है कि अपने किसी प्रियजन को मृत्यु अथवा तलाक के द्वारा खो देने के बाद जिन्होंने गहरे अकेलेपन का अनुभव किया है। कलीसिया के अच्छे सदस्यों को भी इस दुःखद अकेलेपन का शिकार होना पड़ता है। घर खाली हो चुका है। बच्चे या तो बहुत छोटे हैं जो अभी समझदार नहीं हुए अथवा वयस्क होकर अपनी-अपनी दुनिया बसा चुके हैं। समाज का ताना-बाना ही ऐसा है कि किसी के पास दूसरे के लिए समय नहीं है। परिणाम? अकेलापन! 3. बेरोजगारी अथवा रिटायरमेंटः- व्यक्ति जब किसी कारण से बेरोजगार हो जाता है तो लोग उससे मिलना-जुलना कम कर देते हैं और वह अकेलापन महसूस करने लगता है। जब कोई रिटायर हो जाता है तो एकाएक सबके लिए अनुपयोगी अथवा बोझ सा बन जाता है। लोग उससे कतराने लगते हैं। सक्रियता के अभाव में उसे अकेलापन घेरने लगता है। 4. लम्बी बीमारी अथवा निर्बलता (अपंगता) – यदि कोई व्यक्ति किसी हादसे का शिकार होकर बीमार हो जाता है अथवा अपंग हो जाता है तो उसके परिवार वालों के लिए कठिनाई का कारण उत्पन्न हो जाता है। बीमारी लम्बी खिंच गयी तो फिर सबका धैर्य टूटने लगता है। मित्र भी एक निश्चित दूरी तक साथ निभा पाते हैं फिर धीरे-धीरे मिलने-जुलने वालों की संख्या कम होती जाती है। शारीरिक अथवा मानसिक रूप से अपंग व्यक्ति के सामने तो मुसीबतों का पहाड़ सा टूट पड़ता है। उसे अपनी छोटी से छोटी ज़रूरतों के लिए दूसरों की मदद का मोहताज होना पड़ जाता है। परिणाम-स्वरूप एक आत्मग्लानि सी उसके मन में पनपने लगती है और वह अकेलापन का गहरा शिकार हो जाता है। 5. अपराध अथवा बुरे व्यसनः- अपने आसपास के माहौल से प्रभावित होकर यदि किसी को कोई बुरे व्यसन का शिकार होना पड़े अथवा अपनी या किसी दूसरे की ग़लती से वह किसी अपराध में लिप्त हो जाए तो उसे सदैव अपना सम्मान खो जाने का भय सताता रहता है। परिणामस्वरूप वह दोहरी ज़िन्दगी जीता है। भीड़ में रहकर भी वह सहजता का अनुभव नहीं करता। परिणाम होता है अकेलापन। 6. किसी हादसे का शिकार होना (बलात्कार इत्यादि) - कम उम्र के नवयुवक अथवा भूलवश यदि अपनी सीमाएं लांघ जाएं और अपनी पवित्रता खो बैठें तो वे अपने आपको अकेला पाते हैं। किसी दंगे-फसाद अथवा किसी अन्य परिस्थिति में यदि कोई युवती अथवा महिला बलात्कार की शिकार हो जाए तो उसे अकेलेपन का गहरा अहसास होता है। जीवन उन्हें कठिन जान पड़ता है। 7. सामाजिक पूर्वाग्रह एवं मान्यताएं – हम ऐसे समाज में रहते हैं जहां अनेक प्रकार की मान्यताएं, पूर्वाग्रह एवं वर्जनाएं प्रबल हैं। जाति, भाषा, रंग, हैसियत, व्यवसाय, योग्यता इत्यादि पर आधारित अनेक अलिखित नियम एवं परम्पराएं हैं जिन्हें व्यक्ति मानने को विवश हैं। अपनी परिधि से बाहर जा न पाने की विवशता एवं कुंठा व्यक्ति को कूप-मंडूक एवं अकेलेपन का शिकार बना देती है। अकेलापन दूर करने हेतु क्या करें? जो अकेले हैं उनकी सहायता मैं कैसे करूं? अथवा कलीसिया क्या करे जिससे लोग अकेलेपन से बच सकें? 1. अपने आरामदेह माहौल से निकलें और जाकर उसके साथ बैठें जो अकेलापन महसूस करता होः- किसी अकेलापन महसूस करने वाले व्यक्ति को अपने पास आमंत्रित करें। उसके साथ बैठें। उसे अपने साथ किसी आयोजन में अथवा कलीसिया में लेकर आएं। 2. अपने आसपास बैठें हुए अजनबियों से कुछ बातचीत करें जिनसे आप अपरिचित हैं – अवकाश के दिनों में लोग कलीसिया में आते हैं। वे आराधना सभा में भाग लेते हैं और फिर बाइबिल अध्ययन में भी रूकना चाहते हैं। जब वे आते हैं तो कोई उन्हें दरवाज़े पर स्वागत नहीं करता। सभा के बाद कोई बातचीत नहीं करता अथवा कक्षा में आमंत्रित नहीं करता। वे मसीह में भाई अथवा बहिन होते हुए भी स्वयं को सबके मध्य अकेला, अपरिचित एवं अनचाहा महसूस करते हैं। ऐसे लोगों की ओर अपना हाथ बढ़ाएं। उनसे परिचित हों तथा उन्हें संगति में सम्मिलित करें। 3. एकाकी लोगों को सार्थक सेवकाई में संलग्न करें – अनेक वृद्धजन अकेले रहते हैं। उनकी स्वास्थ्य संबंधी अनेक समस्याएं होती हैं। उन्हें अपने परिवार में आमंत्रित करें। अपने बच्चों से उनका परिचय कराएं। वे दादा-दादी या नाना-नानी बनकर बच्चों के प्रति अपनापन बांट सकेंगे। वे कलीसिया में बहुत सारे कार्य नहीं कर पाएंगे परन्तु बच्चों के साथ खेल तो सकते हैं। उनके स्वास्थ्य में सुधार हो सकेगा जब वे किसी के लिए कुछ सार्थक कर पाएंगे। 4. एकाकी लोगों के लिए गतिविधियां आयोजित करें – एकाकी लोगों के लिए विभिन्न गतिविधियां आयोजित करने पर उन्हें एक-दूसरे से मिलने में मदद मिलेगी। सम्भवतः उन्हें अपना मित्र अथवा जीवनसाथी मिल जाए। हम मसीहियों के लिए क्या यही उत्तम होगा कि हम एकाकी लोगों के लिए कुछ कर सकें एवं उनके साथ एक ही विश्वास में शामिल हो सकें। 5. एकाकी लोगों को अपने छोटे झुण्ड का हिस्सा बनाएं – यदि आप किसी सण्डे स्कूल कक्षा, युवा समूह, महिला समाज, प्रार्थना सभा एवं बाइबिल अध्ययन दल के सदस्य हैं, जो किसी के घर में मिलते हैं। यदि आप पुरूषों के एक छोटे झुण्ड के अंग हैं तो एकाकी लोगों को इसमें शामिल होने का आग्रह करें। महिलाओं की अपेक्षा पुरूषों को अकेलापन झेलना अधिक कठिन होता है। 6. एकाकी लोगों को अपने छोटे झुण्ड का अनिवार्य अंग बनने को उत्साहित करें – लोगों को केवल सभाओं में बुलाना पर्याप्त नहीं है। अक्सर हम नए लोगों से बातें तो करते हैं किन्तु शीघ्र ही मुड़कर अपने पुराने मित्रों के साथ पुनः वार्तालाप में लग जाते हैं। परिणामतः वह व्यक्ति पहले से कहीं अधिक अकेलापन महसूस करने लगता है। उन्हें न केवल बुलाएं अपितु उन्हें अपने झुण्ड का अनिवार्य अंग बनाएं। 7. अकेले व्यक्तियों को भोजन अथवा बाजार जाने में शामिल करें – अकेले लोग अपने खान-पान के प्रति लापरवाह रहते हैं। उन्हें अक्सर अपने साथ भोजन में शामिल करने हेतु निमंत्रण दें। उन्हें बाजार भी ले जाएं तथा उनसे वस्तुएं खरीदने हेतु सलाह दें। उनकी जरूरतों की कुछ वस्तुएं दिलाएं जिससे उन्हें भी प्रोत्साहन मिल सके। 8. अकेले लोगों की बातें सुनने हेतु सदैव उपलब्ध रहें – कई बार हम वास्तव में नहीं सुनते। हम अपने ही कामों में उलझे रहते हैं। हम अपनी ही बात कहते जाते हैं, दूसरों की नहीं सुनते। इससे वे अपने आपको उपेक्षित महसूस करते हैं। उनकी भी बातें सुनें एवं उचित प्रत्युत्तर दें। वे आपकी संगति की प्रशंसा करेंगे। 9. समय निकालकर अकेले लोगों से मिलने जाएं – जीवन की तमाम व्यस्तताओं के बावजूद भी समय निकालकर अकेले लोगों से मुलाकात करने जाएं। इससे उनके मन में आपके प्रति प्रेम, कृतज्ञता एवं भरोसा उत्पन्न होगा। 10. उनके साथ प्रार्थना करें – अकेले व्यक्तियों के साथ बातचीत करें। उन्हें प्रोत्साहन दें तथा उनकी समस्याओं के लिए प्रार्थना करें। परमेश्वर के वचन से पढ़कर सुनाएं। अपनी आशीषें उनके साथ बांटें आपकी गवाही से नयी उमंग आएगी। वे भी परमेश्वर पर दृढ़ भरोसा करने हेतु उत्साहित होगें। और अन्ततः हम सब भी कभी न कभी अकेलापन महसूस करते हैं। बेहतर यही है कि दूसरे के अकेलेपन के दर्द को महसूस करना सीखें। हम दूसरों का अकेलापन बांट लेंगे तो हमारा अकेलापन काफी हद तक छंटने लगेगा।
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| Last Updated on Thursday, 20 March 2008 15:22 |



