| स्वामी एवं दास का दृष्टान्त |
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| Written by डॉ. श्रीमती इन्दु लाल | |||
| Friday, 08 September 2006 20:11 | |||
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प्रस्तावना एवं पृष्ठभूमिः- जब चेलों में प्रश्न उठा कि हम में से बड़ा कौन है? तब प्रभु यीशु मसीह ने कहा कि यदि कोई प्रथम स्थान चाहें तो सबसे अन्तिम हो और सबका सेवक बने। (मरकुस 9:34-35, मत्ती 20:27-28) वह जो ईश्वर था सबका दास बन गया और दास की नम्रता और दीनता प्रगट करने के लिए उसने स्वयं अपने शिष्यों के पैर धोए। (यूहन्ना 13:4-5, 12-17) ‘‘उसने परमेश्वर के स्वरूप में होते हुए भी परमेश्वर के समान होने को अपने अधिकार में रखने की वस्तु न समझा। उसने अपने आपको ऐसा शून्य कर दिया कि दास का स्वरूप धारण कर मनुष्य की समानता में हो गया। इस प्रकार मनुष्य के रूप में प्रगट होकर स्वयं को दीन किया और यहां तक आज्ञाकारी रहा कि मृत्यु वरन् क्रूस की मृत्यु भी सह ली।’’ (फिलिप्पियों 2:6-8) प्रभु यीशु मसीह चाहता था कि प्रत्येक विश्वासी भी सिर्फ अधिकार जताने वाला न हो किन्तु नम्र, दीन एवं कर्मठ हो। कार्य एवं ज़िम्मेदारियों को पूरा करना परमेश्वर पर एहसान जताने के लिए नहीं किन्तु अपने कर्तव्य पूरे करने के व्यवहार से सम्पूर्ण समर्पण से किया जाना चाहिये। इसी उद्देश्य को प्रभु यीशु मसीह ने स्वामी एवं दास के दृष्टान्त द्वारा चिञित किया। विषय विस्तुः- प्रभु यीशु मसीह ने यह दृष्टान्त एक प्रश्न से प्रारंभ किया कि तुम में से कौन ऐसा है जिसका दास हल चलाता और भेड़ों को चराता हो और जब दास खेत से लौटकर आए तो वह दास से कहे शीघ्र आ भोजन करने बैठ? क्या वह उससे नहीं कहेगा कि मेरे खाने के लिए कुछ बना और साफ वस्ञ पहन तथा जब तक मैं खा पी न लूं मेरी सेवा कर तत्पश्चात तू भी खा पी ले? आज्ञाओं का पालन करने के लिए क्या वह अपने दास को धन्यवाद देगा? ‘‘इसी प्रकार तुम भी जब उन सब आज्ञाओं का पालन कर लो जो तुम्हें दी गई हैं तो कहो हम अयोग्य दास हैं हमने तो केवल वही किया है जो हमें करना चाहिए था।’’ व्याख्याः- पहले ग़ुलामी की प्रथा थी। स्वामी ग़ुलामों की आधारभूत आवश्यकताओं की पूर्ति करते थे और बदले में उनसे कठोर श्रम करवाते थे। ग़ुलामों को स्वामी के हर आदेश का ख़ामोशी से पालन करना पड़ता था। वे स्वामियों की आज्ञापालन एवं सेवा को ही अपना धर्म एवं कर्तव्यकर्म समझते थे। अच्छे ग़ुलाम अपने स्वामी के प्रति पूर्ण वफादार एवं समर्पित होते थे। दिन भर के कठोर परिश्रम के बावजूद घर आकर वे नहाकर, स्वच्छ कपड़े पहनकर पुनः अपने मालिक की सेवा में हाज़िर होते। उनके लिए वे भोजन की व्यवस्था करते, उनके सम्पूर्ण आराम का ध्यान रखते और तब फिर स्वयं भोजन करते थे। यह सब स्वामियों एवं दासों के बीच सामान्य एवं आम बात थी। इन सब कार्यों को दास बड़ी नम्रता एवं दीनतापूर्वक अपना कर्तव्य एवं ज़िम्मेदारी समझकर पूर्ण करते थे। इनके बदले में न तो स्वामी उन्हें धन्यवाद कहते थे और न ही दास स्वामी से यह अपेक्षा ही करते थे कि स्वामी उनका एहसान मानकर उन्हें धन्यवाद दें। प्रभु यीशु मसीह ने प्रगट किया कि परमेश्वर भी विश्वासियों से ऐसे ही व्यवहार की अपेक्षा करता है। ‘‘जैसा मसीह यीशु का स्वभाव था वैसा ही हमारा भी स्वभाव हो।’’ (फिलिप्पियों 2:5) मसीह जगत में इसलिए नहीं आया कि उसकी सेवा टहल की जाए, पर इसलिए आया, कि आप सेवा टहल करे और बहुतों की छुड़ौती के लिये अपना प्राण दे। (मरकुस 10:45) सिर्फ ऊंचे पद पर आसीन होकर अधिकार परिश्रम पूर्वक कार्य करना है। जितनी अपेक्षा है यदि सिर्फ उतना ही किया तो परमेश्वर की दृष्टि में निकम्मे ठहरेंगे (लूका 17:10) मसीही जीवन अपेक्षा से बढ़कर करने का जीवन है। यदि कोई कुरता लेना चाहे तो दोहर भी दे दे। कोई कोस भर बेगार में ले जाए तो उसके साथ दो कोस चला जा। (मत्ती 5:40-41 के अनुसार) जिस प्रकार दास अपने स्वामी के लिए कार्य कर उस पर कोई एहसान नहीं करता उसी प्रकार हम परमेश्वर के राज्य के लिए चाहे कितने भी कार्य करें, परिश्रम करें एवं सच्चाई से उसकी आज्ञाओं का पालन करें किन्तु फिर भी हम परमेश्वर का एहसान नहीं करते सिर्फ परमेश्वर के प्रति अपने कर्तव्यों की पूर्ति करते हैं। इसलिए अपने कार्यों एवं उपलब्धियों पर हमें घमण्ड नहीं करना चाहिए। किन्तु नम्रता एवं दीनता से प्रभु की सेवा के लिए निरन्तर आगे बढ़ते जाना चाहिये। जिस प्रकार दास स्वामी से अपनी दिनचर्या के बाद धन्यवाद या पुरस्कार की अपेक्षा नहीं करता उसी प्रकार हमें भी परमेश्वर से पृथ्वी पर किसी भी प्रकार के पुरस्कार की अपेक्षा नहीं करना चाहिये क्योंकि हमारा पुरस्कार संसार में नहीं किन्तु स्वर्ग में है, देखा हुआ नहीं किन्तु अनदेखा है, नष्ट होने वाला नहीं किन्तु चिरस्थायी है, अनन्त का है। ये पुरस्कार हमारी उपलब्धियों के फलस्वरूप हमें नहीं मिलेगा और न ही किसी भी आधार पर हम यह दावा ही कर सकते हैं कि इस पर हमारा अधिकार है (इफिसियों 2:9, तीतुस 3:5) परन्तु यह पुरस्कार हमें पूर्ण रूप से परमेश्वर की दया एवं अनुग्रह से मिलेगा जो उसने प्रभु यीशु मसीह द्वारा हम पर किया है। जब एक सांसारिक स्वामी स्वयं के सुख-सुविधा एवं आराम के लिए अपने दास का भरपूर उपयोग करता है तो परमेश्वर के दासों ये तो यह अपेक्षा है ही कि वे परमेश्वर का भय मानें और उसके मार्गों पर चलें, उससे प्रेम करें और उसका भय मानें अपने पूरे मन और अपने सारे प्राण से उसकी ‘‘सेवा’’ करें। (व्यवस्थाविवरण 10:12)परमेश्वर ने हमारी ‘‘सेवा’’ के लिए अपने एकलौते पुत्र को हमारे लिए बलिदान कर दिया। उसने स्वर्ग का सिंहासन छोड़ दिया, पृथ्वी पर आकर सभी प्रकार के अभाव, तिरस्कार एवं निन्दा सही। मानव होकर ही सभी विषम परिस्थितियों के बाबजूद पवित्र एवं परमेश्वर को ग्रहण योग्य जीवन जीकर दिखाया। आदर्श जीवन शौली का उदाहरण हमारे सामने रखा। हमारे उद्धार के लिए एवं पापों को क्षमा के लिए उसने क्रूस की मृत्यु भी सह ली। एक दास के रूप में उसने हमारे लाभ के ख़ातिर सब कुछ सह लिया, सब कुछ कर दिया। जितना कुछ उसने हमारे लिए किया उसका बदला तो हम कभी उसे दे नहीं सकते किन्तु उसकी अपेक्षा है कि हम उसकी सेवा सच्चाई से, पूरी शक्ति एवं पूरी लगन से करें। व्यावहारिक पक्ष एवं आत्मिक शिक्षाः- परमेश्वर द्वारा सौंपी गई हर एक ज़िम्मेदारी को एक अच्छे सेवक के रूप में नम्रता एवं दीनतापूर्वक ख़ामोशी से सम्पूर्ण समर्पण एवं लगन से पूरी करना है। हो सकता है कि इस संसार में हमारी अच्छाई का एहसान न मानकर कोई धन्यवाद भी न दे या बदले में हमें बुराई मिले किन्तु फिर भी परमेश्वर की आज्ञा पूरी करना प्रत्येक विश्वासी का कर्तव्य है क्योंकि इसका प्रतिफल देने वाला हमारा स्वर्गीय परमेश्वर है।
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| Last Updated on Thursday, 20 March 2008 18:37 |



