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एड्स : एक ज्‍वलंत समस्‍या PDF Print E-mail
Written by डॉ. डेविड हेनरी   
Saturday, 02 September 2006 18:03

चिकित्‍सा क्षेत्र के विकास का तथा विकसित उपचार पद्धति तथा विभिन्‍न रोगों को प्रारम्भिक अवस्‍था में ही खोज लेने के विभिन्‍न मशीनों के विकास से यह परिकल्‍पना विकसित हो रही थी कि मनुष्‍य सन् 2000 ईस्‍वी तक सभी को स्‍वास्‍थ्‍य प्रदान करने में सक्षम हो जाएगा। किन्‍तु सन् 1981 में अमेरिका में एक ऐसी बीमारी का पता लगा जिसका ना ही उपचार संभव है और ना ही व्‍य‍वस्थित रोकथाम। यह बीमारी एक जीवाणु से होती है जिसे ह्यूमन डेफीशियेन्‍सी जीवाणु नाम से जाना जाता है। इस जीवाणु से इन 10 वर्षों के अन्‍तराल में लगभग 10–15 लाख लोग ग्रसित हो चुके है तथा भारत वर्ष में लगभग 5000 व्‍यक्ति प्रतिदिन इस जीवाणु की गिरफ्त में आ रहे हैं। सन् 2000 तक लगभग 30 लाख से 40 लाख लोगों की इस जीवाणु से ग्रसित होने की संभावना है।
 
यह जीवाणु मुख्‍य रूप से रक्‍त में उपस्थित श्‍वेत रक्‍त कोशिकाओं का विनाश करता है जिससे मनुष्‍य के शरीर में विभिन्‍न बीमारियों से लड़ने की क्षमता (प्रतिरोधक क्षमता) कम हो जाती है जिससे लगातार बुखार, भार में कमी एवं लम्‍बे समय से लगातार दस्‍त का होना जैसे लक्षण परिलक्षित होते हैं। इसके अलावा शरीर में गिल्टियों का विकास, विभिन्‍न जीवाणुओं, विषाणुओं तथा फफूंद का शरीर में विकास एवं अत्‍यंत असहाय, कष्‍टप्रद स्थिति में मनुष्‍य की मौत होती है। इस बीमारी को एड्स के नाम (एक्‍वायरड इम्‍यूनो डेफीशिन्‍येसी सिन्‍ड्रोम) से जाना जाता है।
 
यह रोग मुख्‍य रूप से उन लोगों में देखा गया है जो वेश्‍यावृत्ति में, बहुयौन संबंधों में तथा सुई द्वारा विभिन्‍न हानिकारक नशीले पदार्थ लेने में लिप्‍त हों। इसके अलावा यदि रोगी व्‍यक्ति का रक्‍त किसी स्‍वस्‍थ्‍य मनुष्‍य को दिया जावे तो उसे भी यह रोग हो सकता है। इस रोग से ग्रसित महिला के शिशु को भी यह रोग हो सकता है। यह समस्‍या इतनी भयावह है जिसका समाधान विज्ञान भी पूर्ण रूप से पाने में अक्षम रहा है। किन्‍तु धर्मशास्‍त्र के सन्‍दर्भ में एड्स के विकास एवं समाधान का सम्‍पूर्ण चित्रण है, जिसके परिपेक्ष्‍य में एड्स के निम्‍नलिखित कारण संभावित हैं।
 
(1)परमेश्‍वर की उपेक्षा – परमेश्‍वर की उपेक्षा आज मानव के नैतिक तथा चारित्रिक पतन का मुख्‍य कारण है। आज समलैंगिक संगठन, बहुयौन संबंध तथा विवाह पूर्व यौन संबंध समाज का अंग, या आधुनिक परस्‍ती के मापदण्‍ड बनते जा रहे हैं। इस विषय में रोमियों 1:32 में स्‍पष्‍ट रूप से लिखा हुआ है कि वे तो परमेश्‍वर की यह विधि जानते है कि ऐसे काम करने वाले मृत्‍यु के दण्‍ड के योग्‍य हैं, तौभी न केवल आप ही ऐसे काम करते हैं वरन् करने वालों से भी प्रसन्‍न होते हैं। परमेश्‍वर की लगातार उपेक्षा इस बीमारी के प्रसार का मुख्‍य कारण है।
 
(2)बालकों के विकास में माता–पिता की उत्‍तरदायित्‍वहीनता – नीतिवचन 22:6 में लिखा है कि लड़के को शिक्षा उसी मार्ग की दे जिसमें उसको चलना चाहिए और वह बुढ़ापे में भी उससे न हटेगा। आज की विडम्‍बना यह है कि आज मानव भौतिकवाद की रफ्तार में इतना संलग्‍न हो गया है कि उसके पास अपने बालकों को सही मार्गदर्शन देने का समय नहीं है तथा अश्‍लील साहित्‍य, वीडियो फिल्‍म, टी.वी. बालकों को दिग्‍भ्रमित कर रहे हैं इसके अलावा व्‍यक्ति आज के भौतिकवाद, चमक–दमक, ऐश्‍वर्य तथा राजनैतिक व्‍यक्ति से इतना प्रभावित हो चला है कि वह अपने आप में दिशाविहीन है तथा ऐसी स्थिति में अपने बालकों का सही मार्ग दर्शन करने में अक्षम है।

(3)पारिवारिक संबंधों में असामंजस्‍यता – 2तीमुथियुस 3:1–7 में अंतिम दिनों में मनुष्‍य के जिन अवगुणों का वर्णन किया गया है वे आज पारिवारिक संबंधों में असामंजस्‍यता उत्‍पन्‍न करने के मुख्‍य कारण हैं। स्‍वार्थ, लोभ, अभिमान, माता–पिता की आज्ञा की अवहेलना, कृत्‍घ्‍नता ने पारिवारिक संबंधों की बुनियाद को तहस नहस कर दिया है। इसका मुख्‍य कारण है कि आज मनुष्‍य परमेश्‍वर को नहीं किन्‍तु सुख विलास को अपने जीवन में प्राथमिकता देता है।


(4)व्‍यभिचार एवं परस्‍त्रीगमन – 1कुरिन्थियों 10:8 में स्‍पष्‍ट लिखा है कि और न हम व्‍यभिचार करें, जैसा उनमें से कितनों ने किया और एक दिन में तेईस हज़ार मर गए। दस आज्ञाओं में भी व्‍यभिचार एवं परस्‍त्रीगमन को पूर्णत: वर्जित किया गया है। सदोम, अमोरा के नाश का मुख्‍य कारण व्‍यभिचार ही था। किन्‍तु आज के विज्ञान, साहित्‍य तथा समाज ने इस सत्‍य को नकारने की कोशिश की है। डब्‍लू. एच. ओ. जैसी विश्‍वव्‍यापी संस्‍था इस बीमारी की रोकथाम हेतु नैतिक तथा सद्आचरण का महत्‍व देने के बदले संदेश देती है कि निरोध का इस्‍तेमाल इस बीमारी के प्रसार को रोक सकता है। स्थिति अत्‍यंत ही भयावह है। लोगों ने परमेश्‍वर की सच्‍चाई को झूठ बना डाला है जिसका परिणाम लाखों लोगों की अकाल पीड़ादायक मृत्‍यु है।

(5)कलीसिया की उदासीनता – आज अमेरिका एक ऐसा देश है जो कि हर देशों में मिशन तथा प्रचार कार्यों में परोक्ष अथवा अपरोक्ष रूप से संलग्‍न है किन्‍तु उसी देश में किसी भी कलीसिया का एक भी व्‍यक्ति मसीही आचरण के विषय में आवाज उठाने में अक्षम है। भारतीय कलीसिया के लिए यह एक चुनौ‍ती है तथा कलीसिया के सब अंगों का मिलाकर इस महामारी का सामना करना है।

रोकथाम के उपाय –
(1) परमेश्‍वर की जीवन में प्राथमिकता एवं मसीही आचरण।
(2) रोगी को रक्‍त देने के पूर्व रक्‍त की पूर्ण जांच।
(3) रक्‍त परीक्षण तथा चिकित्‍सा प‍द्धति में उपयोग आने वाले यंत्रों की पूर्ण स्‍वच्‍छता। (जीवाणु तथा विषाणु रहित)
 
डॉ. डेविड हेनरी

Last Updated on Thursday, 20 March 2008 18:27
 
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