| मृत्यु से संबंधित संदेश |
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| Written by डॉ. अजय लाल/ डॉ. इन्दु लाल | |||
| Friday, 28 March 2008 17:27 | |||
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संदर्भः 2कुरिन्थियों 4:16-18,5:1 भूमिकाः- मृत्यु जब भी आती है तो दुःख लाती है। चाहे कोई संत हो, चाहे कितना मज़बूत विश्वासी हो, मृत्यु से संबंधित प्रत्येक लोग दुखित होते हैं क्योंकि मृत्यु संसार में रहते हुए अपने प्रिय जनों से अलगाव लाती है। मृत्यु शारीरिक सांसारिक जीवन का अंत होती है। जो योजनाओं और स्वप्नों को अक्सर अधूरा छोड़ जाने पर विवश कर देती है। मृत्यु अकेलापन लाती है क्योंकि ये परिवार के आधार को, सहारे, प्रेम के केन्द्र को, हम से अलग कर देती है। मानव होने के नाते ये सब बातें बहुत स्वाभाविक हैं, परन्तु तीन बातें हैं जो मसीही के लिए इस पहले पक्ष से कहीं ज्य़ादा प्रमुख हैं।1. मृत्यु का अहसास हमारे जीवनों में परिवर्तन ला सकता हैः- मृत्यु के अहसास से हम अपनी प्राथमिकताओं को सुधार सकते हैं। जीवन में क्या प्रमुख है और क्या नहीं इस बात को समझ सकते हैं। हम अपने संबंधों को सुधार सकते हैं। अक्सर परिवारों और संबंधों में भिन्न विचारधाराओं के कारण असहमतियां बन जाती हैं जिन्हें हम प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लेते हैं और हमारे संबंध टूट जाते हैं परन्तु मृत्यु का अहसास हमें अपने संबंधो को सुधारने का अवसर देता है। मृत्यु के अहसास से परमेश्वर पर हमारी निर्भरता बढ़ जाती है। परमेश्वर की उपस्थिति हमारे प्रिय जन की अनुपस्थिति को पूरा करती है। 2. मृत्यु का यह दुःख भरा अहसास हमारे जीवनों को नई दिशा दे सकता हैः- यह संसार ही व्यक्ति की अंतिम मंज़िल नहीं। बाइबिल में दो हज़ार से अधिक आयतें हैं, परमेश्वर की प्रतिज्ञाएं हैं जो अनंत जीवन से संबंधित हैं। 2कुरिन्थियों 5:1 में लिखा है ‘‘क्योंकि हम जानते हैं, कि जब हमारा पृथ्वी पर डेरा सरीखा घर गिराया जाएगा तो हमें परमेश्वर की ओर से स्वर्ग पर एक ऐसा भवन मिलेगा, जो हाथों से बना हुआ घर पर नहीं, परन्तु चिरस्थाई है।’’ इसी प्रकार इब्रानियों 11:16 में लिखा है ‘‘पर वे एक उत्तम अर्थात् स्वर्गीय देश के अभिलाषी हैं, इसलिए परमेश्वर उन का परमेश्वर कहलाने में उन से नहीं लजाता, सो उस ने उन के लिये एक नगर तैयार किया है।’’ इसी कारण पौलुस हमारे लिए ही लिखता है और जो बात हमारे जीवन में बनी रहनी चाहिए वह यह कि ‘‘और हम तो देखी हुई वस्तुओं को नहीं परन्तु अनदेखी वस्तुओं को देखते रहते हैं, क्योंकि देखी हुई वस्तुएं थोड़े ही दिन की हैं, परन्तु अनदेखी वस्तुएं सदा बनी रहती हैं।’’ (2कुरिन्थियों 4:18) 3. मृत्यु का अहसास हमें परमेश्वर की निकटता में ले जा सकता हैः- जीवन में हम जीने के साधन जुटाने के लिए कितना प्रयास करते हैं। परन्तु मृत्यु के समय जो बात सामने आती है, जो की सबसे प्रमुख है, जो सबसे प्राथमिक है और जिसका प्रभाव अनंतकालिक है वह यह कि परमेश्वर से हमारा संबंध कैसा है। जो कुछ इस संसार में है वह तो एक दिन समाप्त हो जाएगा, पुराना हो जाएगा,। कल या तो यह साज़ो सामान न होगा परन्तु या फिर हम स्वयं नहीं होंगे केवल एक बात अनंत कालिक होगी कि परमेश्वर से हमारा संबंध कैसा है। परमेश्वर से हमारा संबंध इस जीवन में हमें नया जीवन देता है और इस संसार के पार अनंत जीवन की निश्चयता। यीशु ने कहा ‘‘जो मुझ पर विश्वास करता है वह यदि मर भी जाए तौभी जिएगा।’’ (यूहन्ना 11:26) पौलुस लिखता है ‘‘हे मृत्यु तेरी जय कहां रही? हे मृत्यु तेरा डंक कहां रहा? मृत्यु का डंक पाप है; और पाप का बल व्यवस्था है। परन्तु परमेश्वर का धन्यवाद हो, जो हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा हमें जयवन्त करता है। सो हे मेरे प्रिय भाइयों, दृढ़ और अटल रहो, और प्रभु के काम में सर्वदा बढ़ते जाओं, क्योंकि यह जानते हो, कि तुम्हारा परिश्रम प्रभु में व्यर्थ नहीं है।’’(1 कुरिन्थियों 15:55-57) रोमियों 8:55-39 में लिखा है ‘‘कौन हमको मसीह के प्रेम से अलग करेगा? क्या क्लेश, या संकट, या उपद्रव, या अकाल, या नंगाई, या जोखिम, या तलवार? जैसा लिखा है कि तेरे लिये हम दिन भर घात किए जाते है, हम वध होने वाली भेड़ों की नाई गिने गए है। परन्तु इन सब बातों से हम उसके द्वारा जिस ने हम से प्रेम किया है, जयवन्त से भी बढ़कर हैं। क्योंकि मैं निश्चय जानता हूं, कि न मृत्यु, न जीवन, न स्वर्गदूत, न प्रधानताएं, न वर्तमान, न भविष्य, न सामर्थ्य, न ऊचाई, न गहिराई और न कोई और सृष्टि, हमें परमेश्वर के प्रेम से, जो हमारे प्रभु मसीह यीशु में है, अलग कर सेकेगी।’’ यूहन्ना 14:6 में प्रभु यीशु ने कहा ‘‘मार्ग और सच्चाई और जीवन मैं ही हूं।’’ जीवन की हर कठिनाई में वह हमारे लिए रास्ता है। जीवन के छल कपट बुराईयों के वीच में वह हमारा सत्य है। मृत्यु के द्वारा इस सांसारिक समापन के साथ ही वह हमारा अनंत जीवन है। निष्कर्षः- मृत्यु की इस छाया में अपने प्रिय जन से विछोह का अनुभव करते हुए, अकेलेपन का महसूस करते हुए हम इस बात पर विचार करें कि हमें अपने जीवनों और अपनी प्राथमिकताओं में परिवर्तन लाना है। अपने जीवनों को नई दिशा देना है और अनंत जीवन की प्रतिज्ञाओं पर विश्वास करना है। परमेश्वर से अपने संबंधों का मूल्यांकन करना है ताकि उसकी निकटता में बनें रहकर जब हमारा इस संसार से कूच करने का समय आए तो हम भी अनंत जीवन की निश्चयता के साथ इस बात को कह सकें, ‘‘हे मृत्यु तेरी जय कहां रही?’’
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