| समस्या क्या है ? |
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| Written by डॉ. श्रीमती शीला लाल | |||
| Thursday, 08 July 2010 15:06 | |||
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अ. मनुष्य की स्वाभाविक इच्छा होती है कि वह सर्वोच्च रहे ( Be his own boss ) इस प्रकार वह जीवन में परमेश्वर के सिद्धान्तों को नकारता है और कभी खुश नहीं रह पाता। हम बुराईयों की ओर आसानी से खिंच जाते है। हमें सोचना है- - मेरे जीवन में प्रथम स्थान किसका है ? ‘‘मैं जो चाहूंगा वही करूंगा’’ वाला स्वभाव बदलना है। - यदि मुझे कुछ करने से अच्छा लगता है, तो मैं वो करता हूं चाहे ईश्वर का वचन मुझसे इस संबंध में कुछ भी कहें। - ये मेरा जीवन है तो मुझे वैसा ही जीना है जिससे मुझे खुशी मिले। बाइबिल इस तरह के व्यवहार को ---------ठहराती हैं। (पाप) यूहन्ना 16:9 पाप = कौन सर्वोच्च है ? या आपके जीवन का स्वामी प्रभु है ? यदि आप स्वयं को अपने जीवन का स्वामी मानते है तो अनाज्ञाकारिता का निर्णय पाप करना = पाप का परिणाम जो अनाज्ञाकारिता पूर्ण कार्य करें हर एक मनुष्य पाप में पड़ता है लेकिन पाप करने का निर्णय लेकर उसे करना और उसके चुनाव पर निर्भर है। द. कई बार ऐसी कठिन स्थिति में हमें यह महसूस होता है कि अब हमसे कुछ नहीं होगा ईश्वर ही हमें इन कठिनाईयों से बचा सकता हैं। मन की गहराईयों से इस सच्चाई को स्वीकारते हुए अपने जीवन में ईश्वर की कमी व आवश्यकता महसूस करते हुए भी व्यक्ति ---------तरीकों से ईश्वर को खोजने और जानने का प्रयास करते हैं। (गलत) - मेरे परिवार के लोग तो मसीही है इसलिये-----------’’ - इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि मेरा विश्वास क्या है। मुझे केवल मन की सच्चाई से (Sincerely) अपने कार्य करना चाहिये। - मैं अपनी सब बुरी आदतें छोड़ दूंगा। - मैं बहुत मेहनत से अपना कार्य करूंगा कि मुझे उद्धार मिल जाये। - मैं निरंतर कलीसिया आराधना में उपस्थित रहूंगा और अपने धर्म का पालन करूंगा। - धर्म और मार्ग तो बहुत है लेकिन वे सब ईश्वर तक पहुंचाते हैं। यदि मनुष्य सारे जगत को प्राप्त करे और अपने प्राण खोये तो उसे क्या लाभ ? मत्ती 16:26
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