दैनिक मनन

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    पवित्र बनें‘‘क्‍योंकि यह लिखा है, तुम पवित्र बनो, क्‍योंकि मैं पवित्र हूं’’। (1पतरस 1:14-16)हमारा परमेश्‍वर जो कि पवित्र है, वह पवित्रता को आशीषित करता है परन्‍तु अशुद्धता और पाप से घृणा करता है वह...

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समस्‍या क्‍या है ? PDF Print E-mail
Written by डॉ. श्रीमती शीला लाल   
Thursday, 08 July 2010 15:06

अ.  मनुष्‍य की स्‍वाभाविक इच्‍छा होती है कि वह सर्वोच्‍च रहे ( Be his own boss ) इस प्रकार वह जीवन में परमेश्‍वर के सिद्धान्‍तों को नकारता है और कभी खुश नहीं रह पाता। हम बुराईयों की ओर आसानी से खिंच जाते है। हमें सोचना है-

- मेरे जीवन में प्रथम स्‍थान किसका है ? ‘‘मैं जो चाहूंगा वही करूंगा’’ वाला स्‍वभाव बदलना है।

- यदि मुझे कुछ करने से अच्‍छा लगता है, तो मैं वो करता हूं चाहे ईश्‍वर का वचन मुझसे इस संबंध में कुछ भी कहें।

- ये मेरा जीवन है तो मुझे वैसा ही जीना है जिससे मुझे खुशी मिले।
(लेकिन इस सोच के अनुसार जीवन जीने वाले लोगो को भी इससे वास्‍तविक प्रसन्‍नता सुख शान्ति मिलती नहीं उन्‍हे जीवन में कुछ कमी सी लगती है)

बाइबिल इस तरह के व्‍यवहार को ---------ठहराती हैं। (पाप)
हम तो सब के सब भेड़ो की नाई भटक गये थे हममें से हर एक ने अपना अपना मार्ग लिया। यशायाह 53:6
यदि हम कहें कि हम में कुछ भी पाप नहीं तो अपने आप को धोखा देते हैं और हम में सत्‍य नहीं। 1 यूहन्‍ना 1:8

यूहन्‍ना 16:9

पाप = कौन सर्वोच्‍च है ? या आपके जीवन का स्‍वामी प्रभु है ? यदि आप स्‍वयं को अपने जीवन का स्‍वामी मानते है तो अनाज्ञाकारिता का निर्णय

पाप करना = पाप का परिणाम जो अनाज्ञाकारिता पूर्ण कार्य करें हर एक मनुष्‍य पाप में पड़ता है लेकिन पाप करने का निर्णय लेकर उसे करना और उसके चुनाव पर निर्भर है।

ब. पाप परमेश्‍वर से हमारे घनिष्‍ठ संबंध को तोड़ता है, नकारता है। यह हममें परमेश्‍वर का भय तो उत्‍पन्‍न करता है कि हम उसके दण्‍ड के पात्र होगें जिससे हमारी मानसिक शान्ति भंग होती है लेकिन यह भावना हमें परमेश्‍वर की इच्‍छा के विपरीत जीवन जीने को प्रेरित करती हैं। बाइबिल हमें बतलाती है-

तुम्‍हारे अधर्म के कामों ने तुम को तुम्‍हारे परमेश्‍वर से अलग कर दिया है और तुम्‍हारे पापों के कारण उसका मुंह तुम से ऐसा छिपा है कि वह नहीं सुनता। यशायाह 59:2 सबने पाप किया है और परमेश्‍वर की महिमा से रहित हैं। रोमियों 3:23
जब हमारा संबंध परमेश्‍वर से सही नहीं है तो जीवन के प्रत्‍येक क्षेत्र में समस्‍यायें उत्‍पन्‍न होती हैं चाहे वह वैवाहिक सं‍बंध हो, कार्यक्षेत्र की बात हो, पिता पुत्र के संबंध हो, सास बहू के संबंध हो, पड़ोसी से संबंध हो या कोई भी संबंध (relationship)  क्‍यों न हो। धन की समस्‍या भी हमें घेरे रहती है क्‍योकि हम आशीषों के योग्‍य पात्र नहीं बन पाते न उन्‍हे अनुभव करते हैं न उनके प्रति धन्‍यवादित होते हैं न ही उन्‍हे संजाने, विकसित करने, और बेहतर बनाने का कोई प्रयास करते हैं।

स. जब मनुष्‍य के जीवन में इस तरह की समस्‍यायें आती हैं तो वह विभिन्‍न तरीकों से उससे जूझने और उसका समधान करने का प्रयास करता है।

ऐसे भी मार्ग है जो मनुष्‍य को सीधे और मनभावने देख पड़ते है परन्‍तु उसके अन्‍त में मृत्‍यु ही मिलती हैं। नीतिवचन 16:25

द. कई बार ऐसी कठिन स्थिति में हमें यह महसूस होता है कि अब हमसे कुछ नहीं होगा ईश्‍वर ही हमें इन कठिनाईयों से बचा सकता हैं। मन की गहराईयों से इस सच्‍चाई                                                                                                                                                                                 को स्‍वीकारते हुए अपने जीवन में ईश्‍वर की कमी व आवश्‍यकता महसूस करते हुए भी व्‍यक्ति ---------तरीकों से ईश्‍वर को खोजने और जानने का प्रयास करते हैं। (गलत)

- मेरे परिवार के लोग तो मसीही है इसलिये-----------’’ - इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि मेरा विश्‍वास क्‍या है। मुझे केवल मन की सच्‍चाई से (Sincerely) अपने कार्य करना चाहिये।

- मैं अपनी सब बुरी आदतें छोड़ दूंगा।

- मैं बहुत मेहनत से अपना कार्य करूंगा कि मुझे उद्धार मिल जाये।

- मैं निरंतर कलीसिया आराधना में उपस्थित रहूंगा और अपने धर्म का पालन करूंगा।

- धर्म और मार्ग तो बहुत है लेकिन वे सब ईश्‍वर तक पहुंचाते हैं।

ऐसा सामान्‍यतः मनुष्‍य का सोच होता है लेकिन बाइबिल हमें इससे भिन्‍न शिक्षा देती है।

यदि मनुष्‍य सारे जगत को प्राप्‍त करे और अपने प्राण खोये तो उसे क्‍या लाभ ? मत्‍ती 16:26

 
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