| पहला पाठ - पहला धन्य |
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| Written by डॉ. श्रीमती इन्दु लाल | |||
| Friday, 05 February 2010 10:46 | |||
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धन्य वचन - धन्य हैं वे, जो मन के दीन हैं, क्योंकि स्वर्ग का राज्य उन्हीं का है। धन्य का अर्थ – खुश, आशीषित, सन्तुष्ट। दीनता का अर्थ – - हर प्रकार के (शारीरिक, मानसिक, आत्मिक) घमण्ड, लोभ, लालच, स्वार्थ, ‘‘मैं/अहं’’ से मुक्त होना। यह कैसे सम्भव है? यह तभी सम्भव है जब हमारा परमेश्वर के परिप्रेक्ष्य में स्वयं के प्रति और स्वयं के पापों के प्रति सही दृष्टिकोण हो। यही अहसास हमें घमण्ड से भर कर आत्मनिर्भरता के लिए नहीं किन्तु हर एक बात के लिए परमेश्वर पर निर्भरता के लिए प्रोत्साहित करेगा। इसी निर्भरता से हमारे हृदय दीन होंगे और हमारा व्यक्तिगत सम्बन्ध परमेश्वर के साथ सही, मज़बूत और सच्चा होगा। उदाहरण - दीनता का सबसे प्रमुख उदाहरण प्रभु यीशु मसीह स्वयं है। जिसने सब कुछ त्यागकर, सब कुछ सहकर परमेश्वर की योजना को पूरा किया (फिलिप्पियों 2:8)। शद्रक, मेशक, अबेदनगो - ये आग की भट्ठी में डाले जाने को तैयार थे किन्तु परमेश्वर के बदले उन्हें किसी मूर्ति की पूजा करना स्वीकार्य नहीं था। उन्होंने बड़ी निर्भीकता से उत्तर दिया- दानिय्येल 3:18 – परन्तु, यदि नहीं, तो हे राजा तुझे मालूम हो, कि हम लोग तेरे देवता की उपासना नहीं करेंगे, और न तेरी खड़ी कराई हुई सोने की मूरत को दण्डवत् करेंगे। चुंगी लेने वाला - वह धनवान व्यक्ति था किन्तु उसे परमेश्वर की पवित्रता के सामने अपने अधर्मो का, अपनी पापमय दशा का, उसकी महानता के सामने अपनी निम्नता का अहसास था; इसी कारण वह दीनता के साथ कह सका कि हे परमेश्वर मुझ पापी पर दया कर (लूका 18:11)। प्रकाशितवाक्य 3:17 लौदीकिया की कलीसिया से प्रभु यीशु मसीह ने कहा- ‘‘तू जो कहता है, कि मैं धनी हूं, और धनवान हो गया हूं, और मुझे किसी वस्तु की घटी नहीं, और यह नहीं जानता, कि तू अभागा और तुच्छ और कंगाल और अन्धा और नंगा है’’। दीनता के सम्बन्ध में प्रमुख सन्दर्भ - याकूब 4:10 - प्रभु के साम्हने दीन बनो, तो वह तुम्हें शिरोमणी बनाएगा। 1 पतरस 5:5 - तुम सब के सब एक दूसरे की सेवा के लिये दीनता से कमर बान्धे रहो, क्योंकि परमेश्वर अभिमानियों का सम्हना करता है, परन्तु दीनों पर अनुग्रह करता है। मसीही जीवन में दीनता की आवश्ययता - - दीनता के बिना परमेश्वर के साथ सम्बन्ध ही सम्भव नहीं है। - दीनता के बिना व्यक्ति हर प्रकार के घमण्ड, लोभ, लालच व स्वार्थ से इस प्रकार भरा रहेगा कि परमेश्वर की आशीष, आनन्द व सन्तुष्टि उस से कोसों दूर रहेगी। - दीनता के बिना हम किसी से आत्मीय सम्बन्ध स्थापित नहीं कर सकते। - दीनता के बिना आज्ञाकारिता, संयम व विश्वासयोग्यता का जीवन जीना सम्भव नहीं। केवल समझौते का जीवन सम्भव है। - दीनता के बिना स्वर्ग में स्थान प्राप्त करना असम्भव है।
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