| दूसरा पाठ - दूसरा धन्य |
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| Written by डॉ. श्रीमती इन्दु लाल | |||
| Friday, 05 February 2010 10:39 | |||
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धन्य वचन – धन्य हैं वे, जो शोक करते हैं, क्योंकि वे शान्ति पाएंगे। - पापों के अहसास से जब मनुष्य के हृदय में दीनता उत्पन्न होती है तब पापों के लिए शोक करता है। इस प्रकार यह दीनता के बाद की दूसरी कड़ी है। धन्य का अर्थ – खुश, आशीषित, सन्तुष्ट। शोक का अर्थ – दुःख। जीवन में प्रमुख रूप से दो प्रकार के दुख होते हैं। 1. सांसारिक दुःख – जो मृत्यु, बीमारी, दुर्घटना, विश्वासघात, अभाव, विषमताओं आदि के द्वारा हमारे जीवनों में आतें है। यदि हम केवल इन्हीं दुःखों पर दृष्टि करते हैं, इन्हीं को magnify (बड़ा) करते हैं तो ये दुःख हमें निराश और कमज़ोर करते हैं और हमारी दृष्टि केवल स्वयं पर केन्द्रित हो जाती है। उदाहरण - यहूदा इस्कारियोति (इसकी कहानी विस्तारपूर्वक सुनाए)। किन्तु जब हम इन दुःखों को लेकर परमेश्वर के पास जाते हैं और उससे सहायता व सामर्थ्य मांगते हैं तो वह इन दुःखों से हमें उबारता है। वह लाल समुद्रों को दो भागों में बांटता है, पहाड़ों को हमारे सामने से हटाता है, सिंहों के मुखों को बन्द करता है। वह हमारे इन दुःखों को दूसरों के लिए आशीष और गवाही का कारण बनाता है और हमको दूसरों के दुःख बांटने का माध्यम बनाता है। वह हमें इन विषमताओं से गुज़ारकर अपनी महिमा के अनुरूप ढालता है। उदाहरण- हन्नाह (इसकी कहानी विस्तारपूर्वक सुनाएं-लूका 2:36-38)। 2 कुरिन्थियों 1:4 – वह हमारे सब क्लेशों में शान्ति देता है; ताकि हम उस शान्ति के कारण जो परमेश्वर हमें देता है, उन्हें भी शान्ति दे सकें, जो किसी प्रकार के क्लेश में हों। प्रकाशितवाक्य 21:4-5- और वह उन की आंखों से सब आंसू पोंछ डालेगा; और इसके बाद मृत्यु न रहेगी, और न शोक, न विलाप, न पीड़ा रहेगी; पहिली बातें जाती रहीं। और जो सिंहासन पर बैठा था, उस ने कहा, कि देख, मैं सब कुछ नया कर देता हूं: फिर उस ने कहा, कि लिख ले, क्योंकि ये वचन विश्वास के योग्य और सत्य हैं। मत्ती 11:28-29 - हे सब परिश्रम करनेवालो और बोझ से दबे हुए लोगो, मेरे पास आओं; मैं तुम्हें विश्राम दूंगा। मेरा जूआ अपने ऊपर उठा लो; और मुझ से सीखो; क्योंकि मैं नम्र और मन में दीन हूं: और तुम अपने मन में विश्राम पाओगे। भजन संहिता 34:19 - धर्मी पर बहुत सी विपत्तियां पड़ती तो हैं, परन्तु यहोवा उसको उन सब से मुक्त करता है। यशायाह 41:10 - मत डर, क्योंकि मैं तेरे संग हूं, इधर उधर मत ताक, क्योंकि मैं तेरा परमेश्वर हूं; मैं तुझे दृढ़ करूंगा और तेरी सहायता करूंगा, अपने धर्ममय दाहिने हाथ से मैं तुझे सम्हाले रहूंगा। यशायाह 43:1-3 (अ), 4 (अ) - हे इस्राएल तेरा रचनेवाला, और हे याकूब, तेरा सृजनहार यहोवा अब यों कहता है, मत डर, क्योंकि मैं ने तुझे छुड़ा लिया है; मैं ने तुझे नाम लेकर बुलाया है, तू मेरा ही है। जब तू जल में होकर जाए, मैं तेरे संग संग रहूंगा और जब तू नदियों में होकर चले, तब वे तुझे न डुबा सकेंगे; जब तू आग में चले तब तुझे आंच न लगेगी, और उसकी लौ तुझे न जला सकेगी। क्योंकि मैं यहोवा तेरा परमेश्वर हूं। मेरी दृष्टि में तू अनमोल और प्रतिष्ठित ठहरा है और मैं तुझ से प्रेम रखता हूं। यशायाह 51:3 - यहोवा ने सिय्योन को शान्ति दी है, उस ने उसके सब खण्डहरों को शान्ति दी हैः वह उसके जंगल को अदन के समान और उसके निर्जल देश को यहोवा की बाटिका के समान बनाएगा; उस में हर्ष और आनन्द और धन्यवाद और भजन गाने का शब्द सुनाई पड़ेगा। यशायाह 66:13 - जिस प्रकार माता अपने पुत्र को शान्ति देती है, वैसी ही मैं भी तुम्हें शान्ति दूंगा; तुम को यरूशलेम ही में शान्ति मिलेगी। लूका 6:24-26 - परन्तु हाय तुम पर; जो धनवान हो, क्योंकि तुम अपनी शान्ति पा चुके। हाय, पर; जो अब तृप्त हो, क्योंकि भूखे होगे: हाय पर; जो हंसते हो, क्योंकि शोक करोगे और रोओगे। हाय, तुम पर; जब सब मनुष्य तुम्हें भला कहें, क्योंकि उन के बाप दादे झूठे भविष्यद्वक्ताओं के साथ भी ऐसा ही किया करते थे। 2. आत्मिक दुःख - यह स्वयं के पापों का अहसास कर पश्चात्ताप का दुःख होता है। जो हमारे लिए अनन्त आशीष और आनन्द का कारण ठहरता है। यह दुःख अपने आसपास के लोगों की भटकी हुई आत्माओं के लिए भी होता है। 2 कुरिन्थियों 7:10 - क्योंकि परमेश्वर-भक्ति का शोक ऐसा पश्चाताप उत्पन्न करता है जिस का परिणाम उद्धार है और फिर उस से पछताना नहीं पड़ताः परन्तु सांसारिक शोक मृत्यु उत्पन्न करता है। इस दुःख के द्वारा ही मनुष्य संसार के पाप और बुराइयों में आगे बढ़ने से रूकता है, परमेश्वर की ओर मुड़ता है और उसके साथ उसके मार्ग पर आगे बढ़ता है। जिससे निश्चित रूप से उसके जीवन और सन्तुष्टि आती है और उसका जीवन आशीषित होता है। मसीही जीवन में शोक करने की आवश्यकता - इस शोक के बिना पश्चात्ताप सम्भव नहीं है और बिना पश्चात्ताप के विनाश के मार्ग में आगे बढ़ते जाने से रूकना सम्भव नहीं है (लूका 13:3,5)। - इस शोक के बिना परमेश्वर की निकटता में आना और उसके साथ साथ आगे बढ़ना सम्भव है नहीं। क्योंकि वह पवित्र परमेश्वर है और सब प्रकार के अधर्म तथा अपवित्रता के साथ उसकी निकटता में आना सम्भव नहीं है (2 कुरिन्थियों 6:14-18; 1 यूहन्ना 1:5-7; 3:9-10)। - इस शोक के बिना हम ग़लत कार्य, व्यवहार व आचरण में ही आगे बढ़ते आएंगे। जिनके साथ शान्ति, सन्तुष्टि व आनन्द सम्भव है नहीं। - इस शोक के बिना हम परमेश्वर की आशीषों व गवाही के पात्र बन नहीं सकते। संसार की प्रचलित मान्यता है ‘‘आगे भी जाने न तू पीछे भी जाने न तू, जो भी है बस यही एक पल है’’। अतः हर पल का मज़ा लो। खाओं पीओ मस्त रहो, जो जी में आए करो। इस मान्यता के अनुरूप जो लोग आचरण करते हैं, जिनको अपनी आत्मा की चिन्ता होती नहीं, जिनके जीवन में परमेश्वर का भय होता नहीं बस अपनी ही इच्छा ‘‘येनकेन प्रकारेण’’ पूरा करना प्रमुख होता है। आप उनके जीवन पर ज़रा गौर कीजिए। किस प्रकार से हर प्रकार की बुराइयां उन पर हावी होती हैं। किस प्रकार से उन्होंने अपने जीवन को नाना प्रकार के दुःखों से छलनी करके रखा है। फिर वे सोचते हैं कि दुःख को दूर करने लिए नशा, व्यभिचार, मूवीज़ खरीददारी, भोजन एवं सैर सपाटा करें। ये सब बाते दुःख को दूर करने के लिए दर्द की दवा के समान केवल कुछ समय के लिए होती है। किन्तु फिर उनका दुःख और भी अधिक बढ़ता जाता है क्योंकि उनके दुःख का ‘‘कारण’’ इन सब बातों से दूर नहीं होता है। अच्छा डॉक्टर मात्र दर्द का उपचार नहीं करता परन्तु उसके कारण का उपचार करता है। ठीक उसी प्रकार प्रभु यीशु मसीह हमारे सांसारिक व आत्मिक दुःखों के ‘‘कारणों’’ का उपचार करता है। वह उन कारणों को जड़ से दूर करता है और हमारे जीवनों को आशीष, आनन्द व सन्तुष्टि से भरता है।
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