दैनिक मनन

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    प्रभु जो सदैव तत्‍पर है ‘‘परन्‍तु प्रभु मेरा सहायक रहा, और मुझे सामर्थ्‍य दी’’। (2 तीमुथियुस 4:16,17)हम अपनी असफलताओं या मुश्किलों के क्षणों में अक्‍सर निराश हो जाते हैं। हमारी हताशा उस समय और भी...

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तीसरा पाठ - तीसरा धन्‍य PDF Print E-mail
Written by डॉ. श्रीमती इन्‍दु लाल   
Thursday, 04 February 2010 15:51

धन्‍य वचन- धन्‍य हैं वे, जो नम्र हैं, क्‍योंकि वे पृथ्‍वी के अधिकारी होंगे।
जो व्‍यक्ति दीनता से अपने पापों का अहसास करेगा। वहीं पश्‍चात्ताप करेगा। वहीं व्‍यक्ति वास्‍तव में नम्र होगा।

धन्‍य का अर्थ - खुश, आशीषित, सन्‍तुष्‍ट।

नम्र का अर्थ-

- जो व्‍यक्ति अपनी जीभ पर नियंत्रण रखे, जिसकी वाणी मृदु व कोमल हो।

- जो व्‍यक्ति अपने क्रोध, भावनाओं, प्रतिक्रियाओं एवं स्रोतों पर नियंत्रण रखे और कभी भी इनका दुरूपयोग दूसरों के अहित व हानि के लिए नहीं करे।

- जो बदला लेने वाला न हो परन्‍तु क्षमा करने वाला, सम्‍बन्‍धों को जोड़ने एवं सामान्‍य बनाए रखने के लिए यथासम्‍भव पहल तथा प्रयास करने वाला व्‍यक्ति हो।

- जो अपने आप को परमेश्‍वर, परिवार, समाज वे देश के नियमों और कानून के आधीन चलाने वाला व्‍यक्ति हो।
यह आत्‍मा के फल का एक प्रमुख गुण है। यह ऐसी अदम्‍य सामर्थ्‍य है जो आत्‍म नियंत्रण तथा अनुशासन के द्वारा संचालित होती है।

उदाहरण- नम्रता का सर्वप्रथम उदाहरण स्‍वयं प्रभु यीशु मसीह है। जिसने अपने आप को सम्‍पूर्णता से परमेश्‍वर के आधीन किया और अपनी शक्ति का उपयोग कभी भी किसी की हानि के लिए नहीं किया। उसने परमेश्‍वर के साथ हमारे सम्‍बन्‍ध बनाने के लिए पहल तथा पूरा प्रयास किया।

1 पतरस 2:23- वह गाली सुनकर गाली नहीं देता था, और दुःख उठाकर किसी को भी धमकी नहीं देता था, पर अपने आप को सच्‍चे न्‍यायी के हाथ में सौंपता था।

यूसुफ - उसने अपने भाइयों को क्षमा किया। वह चाहता तो उनसे पूरा पूरा बदला ले सकता था। इतना ही नहीं उसने उनके साथ सम्‍बन्‍ध बनाने के लिए पहल व पूरा प्रयास किया (उत्‍पत्त्ति 42:6-,24)। (यूसुफ की कहानी विस्‍तारपूर्वक सुनाएं कि किस प्रकार उसने अपने भाइयों को क्षमा किया और उनकी चिन्‍ता की।

दाऊद- वह शक्तिशाली था। उसके पास दो ऐसे अवसर आए कि वह अपने विरोधी शाऊल को मार सकता था परन्‍तु उसने उसकी कोई हानि नही की (1 शमूएल 24:1-22)।

मूसा – जिसने हमेशा उन लोगों के बचावो के लिए प्रार्थना की जो हमेशा उसके विरोध में कुड़कुड़ाते रहते थे (गिनती 14:27)।

गिनती 12:3 – मूसा तो पृथ्‍वी भर के रहने वाले सब मनुष्‍यों से बहुत अधिक नम्र स्‍वभाव का था।

नम्रता से सम्‍बन्धित बाइबिल का प्रमुख सन्‍दर्भ कुलुस्सियों 3:13 - और यदि किसी को किसी पर दोष देने का कोई कारण हो, तो एक दूसरे की सह लो, और एक दूसरे के अपराध क्षमा करो: जैसे प्रभु ने तुम्‍हारे अपराध क्षमा किए, वैसे ही तुम भी करो।

मसीही जीवन में नम्रता की आवश्‍यकता - मसीही जीवन आज्ञाकारिता का जीवन है यह भावनाओं में बहने का जीवन है ही नहीं। अतः नम्रता बिना के मसीही जीवन सम्‍भव नहीं हों सकता।

- इस संसार में रहते हुए हम में से प्रत्‍येक को हर दिन विभिन्‍न सांसारिक प्रलोभनों, विषम परिस्थितियों एवं जटिल मानसिकता के लोगों का सामना करना पड़ता है। यदि। ऐसे में व्‍यक्ति अपना संतुलन खो बैठे या भड़क जाए या ग़लत कदम उठा ले तो क्‍या ऐसा व्‍यक्ति कभी आशीषित, आनन्दित व सन्‍तुष्‍ट ठहरेगा? नहीं। ये सब विषम परिस्थितियां मात्र अपने प्रमुख उद्देश्‍य से भटकाने के लिए हमारे सामने आती हैं। यदि हम इन पर ध्‍यान केन्द्रित करते हैं तो हम जीवन में कभी भी प्रगति नहीं कर सकते। कभी भी पृथ्‍वी के आधिकारी नहीं हो सकते। जो स्‍वयं को आत्‍मनियंत्रि‍त कर संसार की हर प्रकार की बुराई एवं प्रतिशोध से बचाकर रखेगा वही इस पृथ्‍वी पर आनन्‍द, शान्ति और सन्‍तुष्ठि से रह सकेगा। हमें स्‍मरण रखना है कि हम बुराई कों बुराई से न जीत सकते हैं और न दूर कर सकते हैं।

- मसीही जीवन में वाणी पर नियंत्रण रखने का आदेश है (मत्‍ती 12:36-37; 1पतरस 3:9-10; याकूब 1:26) यह नम्रता के बिना सम्‍भव नहीं है।

- मसीही जीवन में क्षमा करने का आदेश है ( इफिसियों 4:29-32; मत्‍ती 6:14-15) जो बिना नम्रता के सम्‍भव है नहीं।

- नम्रता के बिना व्‍यक्ति का जीवन जलन, क्रोध, निन्‍दा व प्रतिशोध आदि दुर्भावनाओं के द्वारा ही संचालित होगा। ऐसे ही निकम्‍मे बीज उसके ह्रदय में पनपेंगे जिससे निकम्‍मे और कड़वे फल ही उसके जीवन से प्रगट होंगे। ऐसे जीवन परमेश्‍वर की आशीष और गवाही का कारण नहीं बन सकेंगे।

- नम्रता के बिना व्‍यक्ति परमेश्‍वर के अनुरूप नहीं किन्‍तु संसार के अनुरूप आचरण करेगा। जो परमेश्‍वर की दृष्टि में घृणित बात है (रोमियों 8:6-8; याकूब 4:4)।

वचन में ऐसे असंख्‍य उदाहरण हैं जिन्‍होंने स्‍वयं को नम्र किया उन्‍हें परमेश्‍वर ने बहुत प्रतिष्ठित किया। वे ही अन्‍त में आशीषित, आनन्दित और सन्‍तुष्‍ट ठहरे। हम नम्र बनें कि इस संसार के पाप, बुराइयां हम पर हावी न हों और हम वचन की प्रतिज्ञा के अनुसार इस पृथ्‍वी के अधिकारी हो सकें।

 
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