दैनिक मनन

  • सही मार्ग यही है
    सही मार्ग यही है ‘‘जब कभी तुम दाहिनी व बाई ओर मुड़ने लगो, तब तुम्‍हारे पीछे से यह वचन तुम्‍हारे कानों में पड़ेगा, मार्ग यही है, इसी पर चलो’’। (यशायाह 30:21)सड़क पर यात्रा करते हुये कई प्रकार के...

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पांचवां पाठ- पांचवां धन्‍य PDF Print E-mail
Written by डॉ. श्रीमती इन्‍दु लाल   
Thursday, 04 February 2010 15:38

धन्‍य वचन - धन्‍य हैं वे, जो दयावन्‍त हैं, क्‍योंकि उन पर दया की जाएगी।

धन्‍य का अर्थ- खुश, आशीषित, अन्‍तुष्‍ट।

दयावन्‍त का अर्थ- तरस से भरा हुआ हृदय। ऐसा हृदय जिसमें प्रेम के साथ साथ अनुग्रह करने की बात हो। दया ऐसी निःस्‍वार्थ प्रेरणा है जिससे व्‍यक्ति ज़रूरतमन्‍दों के प्रति न केवल संवेदनशील होता है परन्‍तु उनकी यथासम्‍भव मदद भी करता है।

दया, क्षमा और प्रेम का गहरा सम्‍बन्‍ध है। दया वही व्‍यक्ति कर सकता है जिसकें हृदय में प्रेम हो और जो क्षमा करने वाला हो।

क्षमा के द्वारा ही हमारे हृदय से जलन, क्रोध, घमण्‍ड, प्रतिशोध, परनिन्‍दा और अन्‍य दुर्भावनाएं दूर होती हैं। जब तक ये भावनाएं हमारे हृदय में रहेंगी तो जैसे बीज हमारे हृदय में रहेंगे वैसे ही कड़वे और निकम्‍मे फल हमारे जीवनों में दिखाई देंगे और हम कभी किसी का भला नहीं कर सकेगे।

हमें बहुत से लोगों पर दया नहीं आती क्‍योंकि मन में यह अहसास होता है कि ये बेईमान, धोखेबाज़, झूठे, फरेबी और ढ़ोंगी लोग हैं। ऐसे लोगों के प्रति न ही हमारे मन में प्रेम होता है और न ही क्षमा। परन्‍तु जब हम परमेश्‍वर की ओर दृष्टि करते हैं जिसने हमारी ऐसी ही दशा में हम से प्रेम किया हम पर दया की और हमारे अपराधों को क्षमा किया (इफिसियों 2:4-5,8-9)। जब हम देखते हैं कि दया करना आदेश है यह कोई विकल्‍प की नहीं बात है और न ही इसमें कोई शर्त रखीं गई है। यदि हमको परमेश्‍वर की आशीषों व दया के पात्र बनना है तो हमें अन्‍य मनुष्‍यों के साथ दया का व्‍यवहार करना ही करना है।

याकूब 2:13 - क्‍योंकि जिस ने दया नहीं की, उसका न्‍याय बिना दया के होगाः दया न्‍याय पर जयवन्‍त होती है।
दया में अपनी आशीषों को दूसरे ज़रूरतमंदों के साथ बांटने की बात है। कंजूस और स्‍वार्थी व्‍यक्ति कभी खुश नहीं रह सकते। हमें आदेश है कि हमने सेंतमेंत पाया है हमको सेंतमेंत देना है (मत्‍ती 10:8))।

उदाहरण-

1. एक मोमबत्‍ती जलाकर हम उसकी लौ से अनेक मोमबत्तियां जला सकते हैं, ऐसा करने से उस पहली मोमबत्‍ती की लौ कम नहीं हो जाती है।

2. दयालु सामरी (लूका 10:25-37)। इसमें बताएं कि मसीही धर्म मात्र रीति-रिवाज़ों को पूरा करने की बात नहीं बल्कि सम्‍पूर्ण जीवन शैली है। हम मसीह के कार्यो में सक्रियता से संलग्‍न रहते भी मसीह से बिल्‍कुल दूर हो सकते हैं जैसे ये याजक और लेवी थे। उनका मसीह में नया जन्‍म हुआ ही नहीं था। अतः उनके हृदय में ‘‘जीवन’’ नहीं था। उनके हृदय में प्रेम और संवेदनशीलता नहीं थी जैसे किसी निर्जीव वस्‍तु में ये गुण नहीं होते हैं। 1 यहून्‍ना 4:20 में यह बात स्‍पष्‍ट लिखी है कि, ‘‘यदि कोई कहे, कि मैं परमेश्‍वर से प्रेम रखता हूं; और अपने भाई से बैर रखे; तो वह झूठा हैः क्‍योंकि जो अपने भाई से, जिसे उस ने देखा है, प्रेम नहीं रखता, तो वह परमेश्‍वर से भी जिसे उस ने नहीं देखा, प्रेम नहीं रख सकता’’।

3. दुष्‍ट दास का दृष्‍टांत (मत्‍ती 18:23-34)। इसमें बताएं कि किस प्रकार जब राजा की अपार दया के बदले में दास ने अपने संगी दास के साथ दया के बदले दुष्‍टता का व्‍यवहार किया तब वह राजा के क्रोध व दण्‍ड का भागीदार हुआ। उसी प्रकार परमेश्‍वर प्रतिदिन हमारे अनगिनत अपराधों को अपनी अपार दया से माफ़ करता है। हमारी अयोग्‍यताओं के बावजूद हमसे प्रेम करता है, हमारी आवश्‍यकताओं की पूर्ति करता है। इसीलिए वह हमसे अपेक्षा करता है कि हम भी अपने साथी मनुष्‍यों के साथ प्रेम और दया का व्‍यवहार करें।

लूका 6:36 - जैसा तुम्‍हारा पिता दयावन्‍त है, वैसी ही तुम भी दयावन्‍त बनो।

मसीही जीवन में दया की आवश्‍यकता

- इसके बिना हम परमेश्‍वर की आशीषों व गवाही के पात्र नहीं बन सकते।

- इसके बिना परमेश्‍वर हम पर भी दया नहीं करेगा।

- इसके बिना मनुष्‍य निहायता स्‍वार्थी व आत्‍मकेन्द्रित बनेगा।

- इसके बिना मनुष्‍य खुश, आशीषित व सन्‍तुष्‍ट रह ही नहीं सकता क्‍योंकि दूसरों के सुख दुःख बांटने से ही मनुष्‍य स्‍वयं समृद्ध होता है। जितना वह दूसरों को उठाएगा उतना ही अधिक स्‍वयं ऊंचा उठेगा।

जितनी दया हम दूसरों पर करेंगे उतनी ही दया हमारे ऊपर की जाएगी, उतने ही अधिक हम आशीषित, आनन्दित और सन्‍तुष्‍ट ठहरेंगे। कंजूस और स्‍वार्थी व्‍यक्ति कभी आशीषित और आनन्दित नहीं होंगे। बहुत सी नकारात्‍मक बातें हमें दया करने से रोक सकती हैं परन्‍तु हमें परमेश्‍वर की दया और आशीषों की प्रतिज्ञा को ही दयावन्‍त बनने के लिए प्रेरणा मानना है और निरन्‍तर दया का व्‍यवहार स्‍वयं में विकसित करना है।

हमें स्‍मरण रखना है कि संसार के हर एक व्‍यक्ति से परमेश्‍वर ने प्रेम किया और हर एक को बचाने के लिये यीशु ने अपना रक्‍त बहा दिया और क्रूस की मृत्‍यु भी सह ली।

 
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