दैनिक मनन

  • धीरज : परमेश्‍वर की आशीष
    धीरज : परमेश्‍वर की आशीष ‘‘धीरज को अपना पूरा काम करने दो, कि तुम पूरे और सिद्ध हो जाओ और तुम में किसी बात की घटी न रहे’’। (याकूब 1:2-5;5:11)याकूब का पत्र उस समय लिखा गया जब मसीही लोग यातनाओं के दौर से...

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छठवां पाठ -छठवां धन्‍य PDF Print E-mail
Written by डॉ. श्रीमती इन्‍दु लाल   
Thursday, 04 February 2010 15:30

धन्‍य वचन- धन्‍य हैं वे, जिनके मन शुद्ध हैं, क्‍योंकि वे परमेश्‍वर को देखेंगे।

धन्‍य का अर्थ- खुश, आशीषित, सन्‍तुष्‍ट।

मन का अर्थ – मस्तिष्‍क, भावनाएं और इच्‍छाएं। जिन्‍हें प्राण भी कहा गया है।

शुद्ध का अर्थ-  मौलिक, दोषरहित, मिलावटरहित, कपटरहित शुद्ध मन का अर्थ- ऐसा हृदय जिसमें कोई स्‍वार्थ, लोभ-लालच, छल, कपट, जलन, द्वेष, क्रोध, प्रतिशोध, परनिन्‍दा, घृणा, व्‍यभिचार आदि दुर्भावनाएं न हों। जिसमें किसी भी प्रकार के दिखावटीपन की भावना न हो। जो बंटा हुआ या विभाजित न हो।

अब प्रश्‍न यह उठता है कि हम अपने ह्रदय को इस प्रकार शुद्ध कैसे रख सकते हैं?

कुछ सुझाव-

1. परमेश्‍वर की पहली व सर्वप्रमुख आज्ञा का पालन करके। जिसके अनुसार हमको निर्देश है कि हम प्रभु अपने परमेश्‍वर से अपने सारे मन, सारे प्राण, सारी बुद्धि‍ और सारी शक्ति के साथ प्रेम करें। अर्थात् हमारे जीवन का प्राथमिक उद्देश्‍य परमेश्‍वर की महिमा करना हो, उसके राज्‍य का विस्‍तार करना हो, उसकी देह को दृढ़ता और मजबूती प्रदान करना हो, उससे मज़बूत व्‍यक्तिगत सम्‍बन्‍ध बनाना हो।

इसके लिए आवश्‍यक है कि हम अपने जीवनों से उन सभी उलझाने वाले पाप बुराइयों को, सांसारिक प्रलोभनों को और उन सभी बातों को जो परमेश्‍वर के वचन और उसकी इच्‍छा के विरोध में हैं प्रार्थना, संयम एवं आज्ञाकारिता के साथ दूर करें।
‘‘विभाजित ह्रदय को’’ यह उदाहरण देकर समझाएं- एक पांच या दस रूपये का नोट लें। अब उसके दो टुकड़े कर दें। पूछें कि इस आधे आधे टुकड़े की क्‍या कोई उपयोगिता है? उसी प्रकार संसार और परमेश्‍वर के बीच बंटे हुए हृदय की परमेश्‍वर की दृष्टि में कोई उपयोगिता नहीं है।

परमेश्‍वर के प्रति पूरा समर्पण विश्‍वास के द्वारा ही सम्‍भव है। अतः विश्‍वास के मार्ग में आगे बढ़ने में जो भी सन्‍देह एवं प्रश्‍न हैं, उन्‍हें प्रार्थना के साथ वचन की सामर्थ्‍य के द्वारा दूर करें।
कुछ लोग अपने आपको पूर्ण रूप से समर्पित समझने के बावजूद पूर्णत: ग़लत हो सकते हैं यदि उनके विश्‍वास की बुनियाद ही ग़लत हो।
उदाहरण-

(अ) फर्जी चिकित्‍सक - ऐसे डॉंक्‍टर जो फर्जी और नकली दवाईयां देता हो, उससे कोई व्‍यक्ति कितने सच्‍चाई और विश्‍वास से स्‍वीकार करे उसकी बीमारी का उपचार नहीं हो सकेगा।

(ब) बालपुजारी - जो बाल देवता के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित थे स्‍वयं को लहू लूहान करने के लिए तथा अपने बच्‍चों का बलिदान करने के लिए तैयार रहते थे किन्‍तु पूर्ण रूप से ग़लत थे।
नीतिवचन 14:12- ऐसा मार्ग है, जो मनुष्‍य को ठीक देख पड़ता है, परन्‍तु उसके अन्‍त में मृत्‍यु ही मिलती है (नीतिवचन 1215; 16:15)।

नोट- हमारा विश्‍वास कितना अधिक है यह प्रमुख नहीं परन्‍तु हमारा विश्‍वास किस पर यह प्रमुख बात है।
जब हम परमेश्‍वर की पहली आज्ञा का पालन करेंगे तब हमारा पूरा मन, हमारी पूरी शक्ति कहीं और न लगकर उसी पर केन्द्रित होगी। यही एक मात्र तरीका है मन और मस्तिष्‍क के अर्न्‍तद्वन्‍द (विरोधाभास) को समाप्‍त करने का। यही एक मात्र उपाय है जिससे हम आत्‍मा से भी परमेश्‍वर की आराधना कर सकते हैं और अपनी बुद्धि‍ और समझ के द्वारा सच्‍चाई से उसकी आराधना करें। हमारे दिल और दिमाग में किसी भी प्रकार का विरोधाभास न हो।

2. क्षमा- हम परमेश्‍वर की क्षमा को स्‍वीकार करें तभी हम आत्‍मग्‍लानि और पापों के बोझ से मुक्‍त हो सकेंगे और हमारे हृदय शुद्ध हो सकेंगे। हम दूसरों को क्षमा करें तभी हमारे हृदयों से मलिनता और कड़वाहट दूर होगी और हमारे हृदय शुद्ध हो सकेंगे।

यह क्षमा हमें प्रभु यीशु मसीह के बलिदान को स्‍वीकार करने के द्वारा ही प्राप्‍त हो सकती है। इस क्षमा के बिना परमेश्‍वर से हमारे सम्‍बन्‍ध हो नहीं सकते। इसके बिना हम उसके साथ उस पवित्र परमेश्‍वर के साथ सहभागिता कर नहीं सकते और उसको नहीं देख सकते। क्‍योंकि जो कोई पुत्र को मनुष्‍यों के सामने अस्‍वीकार करेगा उसको पिता भी अपने स्‍वर्गीय राज्‍य में स्‍वीकार नहीं करेगा (मत्‍ती 10:33)। उसके बिना न ही हमारी प्रार्थनाएं पिता परमेश्‍वर तक पहुंचेंगे (यूहन्‍ना 14:6) और न ही हम मृत्‍यु के पार उस तक पहुंचेंगे (यूहन्‍ना 16:23,24)।

प्रभु यीशु मसीह ने कभी धर्म परिवर्तन की बात नहीं की परन्‍तु उसने हमेशा ह्रदय परिवर्तन करने का आव्‍हान किया। उसने रीति-रिवाज, परम्‍पराओं एवं धार्मिक आडम्‍बरों को अर्थ व्‍यर्थ ठहराया। क्‍योंकि उसने धार्मिक दिखावे और परम्‍पराओं को नहीं किन्‍तु परमेश्‍वर के साथ व्‍यक्तिगत सम्‍बन्‍धों को ही महत्‍व दिया। उसने परमेश्‍वर की आज्ञा के अनुसार जीवन जीने और मनुष्‍यों के साथ रहते हुए आत्‍मा के फलों को प्रगट करने तथा बांटने की बात को प्रमुखता दी। (बाइबिल में उद्धार को टोप या सुरक्षा आवरण की संज्ञा दी गई है) प्रभु यीशु मसीह को ग्रहण करने के द्वारा हमें उद्धार का ऐसा हेलमेट मिलता है जो संसार के पाप, बुराई एवं प्रदूषण से हमारे विचारों, भावनाओं एवं इच्‍छाओं को सुरक्षित करता है।

‘‘शुद्ध ह्रदय’’ की बात को इस उदाहरण के द्वारा समझाएं।
तीन कांच के ग्‍लास लें। एक में साफ पानी रखें और दूसरे में गन्‍दा। बच्‍चों से पूछें कि कौन सा साफ पानी या शुद्ध पानी है और कौन सा गन्‍दा? अब तीसरे ग्‍लास में थोड़ा सा गन्‍दा पानी और थोड़ा सा साफ पानी डाल दें। पूछें कि ये कैसा पानी है? बतांए – मिलावट वाला। पूछें कि आप साफ पानी पीना चाहेंगे या यह मिलावट वाला। क्‍यों? क्‍योंकि मिलावट वाला पानी भी गन्‍दा पानी बन जाता है।

अब गन्‍दे पानी के ग्‍लास का पूरा पानी तीसरे ग्‍लास में डाल दें और फिर उसमें साफ पानी डालते हुए उसे पूरा साफ करें। बताएं कि वचन का अध्‍ययन करने और उसके अनुसार चलने से इसी प्रकार हमारे हृदय साफ होंगे।

शुद्ध मन बनाए रखने के लिए ग़लत बातों को छोड़ना काफी नहीं है। परन्‍तु निरन्‍तर भले और ठोस कार्य करते रहना अनिवार्य है। इफिसियों 4:25-29 के अनुसार झूठ बोलना छोड़ना पर्याप्‍त नहीं है परन्‍तु सच बोलने की आदत बनाना आवश्‍यक है। चोरी करना बन्‍द करना पर्याप्‍त नहीं है परन्‍तु भलाई करने के अपने हाथों से ऐसा परिश्रम करना जिससे ज़रूरमंदों की मदद करने के लिये कुछ बच रहे आवश्‍यक है। अश्‍लील बातें, अपशब्‍द व बकवाद न करना पर्याप्‍त नहीं परन्‍तु ऐसी बातें करना आवश्‍यक है जिससे सुनने वालों के जीवन आशीषित, प्रोत्‍साहित व अनुग्रहित हों।

3. जितना ज्‍या़दा हम परमेश्‍वर के वचन का अध्‍ययन करेंगे और उसके अनुरूप चलने का प्रयास करेंगे यह विश्‍वास करते हुए कि उसके द्वारा ही हम स्‍वर्ग में परमेश्‍वर को देखने पाएंगे उतने ही अधिक हमारे हृदय शुद्ध होते जाएंगे।

4. हम अपने कार्य एवं ज़ि‍म्‍मेदारियों को परमेश्‍वर के भय में पूरे समर्पण, विश्‍वासयोग्‍यता और परिश्रम से पूरा करें।

उदाहरण- यीशु की माता मरियम। बताएं कि किस प्रकार मरियम ने बचपन से ही स्‍वयं को प्रभु की दासी मान लिया था। उसने उसके भय में स्‍वयं को आगे बढ़ाने का निर्णय किया था। इसी कारण वह संसार की बुराइयों से बची रही। इसी कारण परमेश्‍वर ने अपने बेटे की सांसारिक माता होने के लिए उसे चुना। परमेश्‍वर के इस आदेश को पूरा करने के लिए उसने परमेश्‍वर के सामने कोई शर्त नहीं रखी। उसने उस कार्य को पूरा करने के बदले में किसी बात का लालच अपने मन में नहीं आने दिया। उसने लोगों के द्वारा आलोचना, निन्‍दा व पत्‍थरवाह किये जाने की चिन्‍ता के कारण अपने मन को परमेश्‍वर का कार्य करने से बंटने या हटने नहीं दिया। उसने अपने होने वाले पति यूसुफ से भी बढ़कर परमेश्‍वर की इच्‍छा को पूरा करना माना।

उसने इन सब भय से घबराकर न ही झूठ का सहारा लिया और नहीं अपने मन में किसी के प्रति कोई दुर्भावना पनपने दी न ही परमेश्‍वर पर संदेह ही किया। उसके मन में पूरी तरह ईश्‍वर का अधिकार था। उसका मन साफ पानी की तरह शुद्ध था।
इसी कारण परमेश्‍वर ने स्‍वयं ही यूसुफ के हृदय में मरियम की पवित्रता प्रकट की। उसने मरियम को समाज की आलोचना व पत्‍थवाह से बचाया और उसके मन में यह विश्‍वास दिया कि युग-युगान्‍तर के लोग उसे धन्‍य कहेंगे।
मरियम ने यीशु की माता बनने के बाद भी अपने मन में घमण्‍ड, लालच और स्‍वार्थ को नहीं पनपने दिया। उसने अपना मन साफ और शुद्ध रखा।

इसके लिए आवश्‍यक है कि परमेश्‍वर और हमारे बीच में जो बातें दीवार अथवा खाई के समान होती हैं उन्‍हे हम दूर करें। ये बाते खराब आदतें, ग़लत संगति, अनैतिक सम्‍बन्‍ध नशे, शारीरिक अथवा मानसिक रूप से ग़लत स्‍थान पर होने या अन्‍य वर्जित फलों का उपभोग करने की हो सकती है। कोई ठोस कारण होने पर इन आदतों को छोड़ना कुछ आसान हो जाता है जैसे पति-पत्‍नी बच्‍चे आपसी प्रेम के कारण अपनी ग़लत आदतों को छोड़ने पर विवश होते हैं। वैसे ही यदि हम क्रूस को देखते हैं, अनन्‍त जीवन को देखते हैं तो ये वे बड़े कारण हैं जो स्‍मरण दिलाते हैं कि हम कितने बहुमूल्‍य हैं और हमें संसार की व्‍यर्थ सस्‍ती और उथली बातों में नहीं उलझना है। क्रूस और अनन्‍त पर ध्‍यान करने से हमें अपने जीवन के उदृदेश्‍य और लक्ष्‍य साफ नज़र आते हैं और मंज़ि‍ल स्‍पष्‍ट दिखाई देती है।

5. हम अपने सम्‍बन्‍धों में विश्‍वासयोग्‍य बने रहें।

6. हम संसार से समझौता न करें।
समझौते के जीवन के साथ (बंटे हुए हृदय के साथ) परमेश्‍वर के साथ स‍हभागिता सम्‍भव नहीं।

2. कुरिन्थियों 6:14-18- अविश्‍वासियों के साथ असमान जुए में न जुतो, क्‍योंकि धार्मिकता और अधर्म का क्‍या मेल जोल? या ज्‍योति और अन्‍धकार की क्‍या संगति? और मसीह का बलियाल के साथ क्‍या लगाव? या विश्‍वासी के साथ अविश्‍वासी का क्‍या नाता? और मूरतों के साथ परमेश्‍वर के मन्दिर का क्‍या सम्‍बन्‍ध? क्‍योंकि हम तो जीवते परमेश्‍वर के मन्दिर हैं: जैसा परमेश्‍वर ने कहा है कि मैं उन बसूंगा और उन से चला फिरा करूंगा; और मैं उन का परमेश्‍वर हूंगा, और वे मेरे लोग होंगे। इसलिये प्रभु कहता है, कि उन के बीच में से निकलो और अलग रहो; और मैं उन का परमेश्‍वर हूंगा, और वे मेरे लोग होंगे। इसलिये प्रभु कहता है, कि उन के बीच में से निकलो और अलग रहो; और अशुद्ध वस्‍तु को मत छुओ, तो मैं तुम्‍हें ग्रहण करूंगा। और तुम्‍हारा पिता हूंगा, और तुम मेरे बेटे और बेटियां होगे: यह सर्वशक्तिमान प्रभु परमेश्‍वर का वचन है।

1 यूहन्‍ना 2:15-16 – तुम न तो संसार से और न संसार में की वस्‍तुओं से प्रेम रखो: यदि कोई संसार से प्रेम रखता है, तो उस में पिता का प्रेम नहीं है। क्‍योंकि जो कुछ संसार में है, अर्थात् शरीर की अभिलाषा, और आंखों की अभिलाषा और जीविका का घमण्‍ड, वह पिता की ओर से नहीं, परन्‍तु संसार ही की ओर से है।
मन ही सब बुराइयों का केन्‍द्र है। क्‍योंकि मन से ही हर प्रकार के पाप और बुराई उत्‍पन्‍न होते हैं। अतः हमें अपने हृदय की चौकसी पूरे यत्‍न के साथ करना है।

मत्‍ती 6:24 – कोई मनुष्‍य दो स्‍वामियों की सेवा नहीं कर सकता, क्‍योंकि वह एक से बैर और दूसरे से प्रेम रखेगा, व एक से मिला रहेगा और दूसरे को तुच्‍छ जानेगा; ‘‘तुम परमेश्‍वर और धन दोनों की सेवा नहीं कर सकते’’।

मत्‍ती 15:18-19- पर जो कुछ मुंह से निकलता है, वह मन से निकलता है, और वही मनुष्‍य को अशुद्ध करता है। क्‍योंकि कुचिन्‍ता, हत्‍या, परस्‍त्रीगमन, व्‍यभिचार, चोरी, झूठी गवाही और निन्‍दा मन ही से निकलती है।

मत्‍ती 6:22-23 – क्‍योंकि जहां तेरा धन है वहां तेरा मन भी लगा रहेगा। शरीर का दिया आंख है: इसलिये यदि तेरा आंख निर्मल हो, तो तेरा सारा शरीर भी उजियारा होगा। परन्‍तु यदि तेरी आंख बुरी हो, तो तेरा सारा शरीर भी अन्धियारा होगा; इस कारण वह उजियाला जो तुझ में है यदि अन्‍धकार हो तो वह अन्‍धकार कैसा बड़ा होगा।

रोमियों 7:22-23 – (विभाजित हृदय) – क्‍योंकि मैं भीतरी मनुष्‍यत्‍व से जो परमेश्‍वर की व्‍यवस्‍था से बहुत प्रसन्‍न रहता हूं। परन्‍तु मुझे अपने अंगों में दूसरे प्रकार की व्‍यवस्‍था दिखाई पड़ती है, जो मेरी बुद्धि‍ की व्‍यवस्‍था से लड़ती है, और मुझे पाप की व्‍यवस्‍था की बन्‍धन में डालती है जो मेरे अंगों में है।

मत्‍ती 22:37 सबसे प्रमुख आदेश – उस ने उस से कहा, तू परमेश्‍वर अपने प्रभु से अपने सारे मन और अपने सारे प्राण और अपनी सारी बुद्धि‍ के साथ प्रेम रखा।

मसीही जीवन में मन शुद्ध की आवश्‍यकता-

- हम जैसी स्थिति‍ में है वैसी स्थिति में परमेश्‍वर हमें स्‍वीकार तो करता है परन्‍तु फिर उसके साथ साथ चलने के लिए, उसके साथ सहभागिता रखने के लिए, उसके साथ मज़बूत सम्‍बन्‍ध बनाने के लिए शुद्ध मन का होना आवश्‍यक है।

उदहरण – आदम और हव्‍वा- परमेश्‍वर के साथ सहभागिता रखते थे किन्‍तु जैसे ही पाप उनके जीवन में आया वे परमेश्‍वर से छिप गए।

- मन की शुद्धता के बिना हम परमेश्‍वर की आशीषों के पात्र नहीं बन सकते।

- मन की शुद्धता के बिना हम परमेश्‍वर के गवाह नहीं ठहर सकते।

- मन की शुद्धता के बिना हम दूसरों के लिए आशीष का कारण नहीं बन सकते।

- मन शुद्धता के बिना हम परमेश्‍वर की दृष्टि में अच्‍छे इन्‍सान नहीं बन सकते।

आप स्‍वयं ही सोचिए कि जिस व्‍यक्ति के ह्रदय में सब प्रकार की मलिनता और कड़वाहट भरी हुई है वह कैसे आशीषित, आनन्दित और सन्‍तुष्‍ट रह सकता है। वह कैसे परमेश्‍वर को देख सकता है यह सम्‍भव है ही नहीं। यदि हम चाहते हैं कि हम आनन्दित आशीषित व सन्‍तुष्‍ट रहें तो आवश्‍यक है कि हम परमेश्‍वर के वचन के निर्देश के अनुसार अपने हृदयों को शुद्ध करें।

 
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