| सातवां पाठ -सातवां धन्य |
|
|
|
| Written by डॉ. श्रीमती इन्दु लाल | |||
| Thursday, 04 February 2010 15:16 | |||
|
धन्य वचन – धन्य हैं वे, जो मेल करवाने वाले हैं, क्योंकि वे परमेश्वर के पुत्र कहलाएंगे। धन्य का अर्थ - खुश, आशीषित, सन्तुष्ट। मेल करानेवाले का अर्थ 1. जो अपने आप से मेल से रहे (पाठ में आगे इसकी व्याख्या की गई है)। 2. जो दूसरे मनुष्यों के साथ मेल से रहे और मनुष्यों के बीच मेल कराए। 3. जो सच्चे परमेश्वर के साथ मेल से रहे। 4. जो मनुष्यों का परमेश्वर के साथ मेल कराए। नोट – मेल कराने का यह मतलब कतई नहीं है कि हम सच्चाई को प्रगट न करें या लड़ाई का अंदेशा देखकर कैसा भी समझौता कर लें या समस्या का समाधान न करें और ऐसा दिखाएं जैसे कोई समस्या है ही नहीं। परन्तु बात को सही तरीके से, सही शब्दों में, सही समय पर कहें। उदाहरण- एस्तेर रानी (एस्तेर 4:16,5,7; 8:3)। अपने आप से मेल से रहने का अर्थ – बहुत बार हमारा दिल कुछ कहता है और दिमाग कुछ और। बहुत बार हमारी शारीरिक अभिलाषाएं हमारी आत्मिकता को दबाती हैं और ज्य़ादा प्रबल हो जाती हैं। हमारा विवेक हमको ग़लत कार्य करने के लिए मना करता है, परन्तु शरीर की अभिलाषाएं हम पर हावी होती है। प्रश्न यह उठता है कि हम स्वयं से मेल के साथ किस प्रकार रहें? 1. इसके लिए एक मात्र यही उपाय है कि हम अपने जीवन को सम्पूर्णता से परमेश्वर को समर्पित कर दें। उसे ही अपने जीवन का मालिक और स्वामी बना दें। इसके द्वारा हमारा स्वयं से मेल हो जाएगा। हम ग़लत स्थान पर नहीं जाएंगे, ग़लत संगति नहीं करेंगे, ग़लत भाषा का उपयोग नहीं करेंगे, ग़लत प्रतिक्रियाएं नहीं करेंगे, ग़लत कार्य नहीं करेंगे, ग़लत निर्णयों से बचेंगे। करें या न करें वाली दुविधा की स्थिति से बच जाएंगे। पहले से किया गया यह निर्णय हमें बहुत सी बुराइयों से बचा लेगा और दूर रखेगा। रोमियों 7:25 – मैं अपने प्रभु यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर का धन्यवाद करता हूं; निदान मैं आप बुद्धि से तो परमेश्वर व्यवस्था का, परन्तु शरीर से पाप की व्यवस्था का सेवन करता हूं। रोमियों 8:6-8 - शरीर पर मन लगाना तो मृत्यु है, परन्तु आत्मा पर मन लगाना जीवन और शान्ति है। क्योंकि शरीर पर मन लगाना तो परमेश्वर से बैर रखना है, क्योंकि न तो परमेश्वर की व्यवस्था के आधीन है, और न हो सकता है। और जो शारीरिक दशा में हैं, वे परमेश्वर को प्रसन्न नहीं कर सकते। रोमियों 8:14 – इसलिये कि जितने लोग परमेश्वर के आत्मा के चलाए चलते हैं, वे ही परमेश्वर के पुत्र हैं। 1 पतरस 2:11- हे प्रियो मैं तुम से बिनती करता हूं, कि तुम अपने आप को परदेशी और यात्री जानकर उन सांसारिक अभिलाषाओं से जो आत्मा से युद्ध करती हैं, बचे रहो। 1 यूहन्ना 3:9-10 - जो कोई परमेश्वर से जन्मा है वह पाप नहीं करता; क्योंकि उसका बीज उस में बना रहता है; और वह पाप कर ही नहीं सकता, क्योंकि परमेश्वर से जन्मा है। गलतियों 5:16-17 - पर मैं कहता हूं, आत्मा के अनुसार चलो तो तुम शरीर की लालसा किसी रीति से पूरी न करोगे। क्योंकि शरीर आत्मा के विरोध में, और आत्मा शरीर के विरोध में लालसा करती है और ये एक दूसरे के विरोधी है; इसलिये कि जो तुम करना चाहते हो वह न करने पाओ। कुलुस्सियों 3:5-10 – इसलिये अपने उन अंगो को मार डालो, जो पृथ्वी पर हैं, अर्थात् व्यभिचार, अशुद्धता, दुष्कामना, बुरी लालसा और लोभ को जो मूर्ति पूजा के बराबर है। इन ही के कारण परमेश्वर का प्रकोप आज्ञा न माननेवालों पर पड़ता है। और तुम भी, जब इन बुराइयों में जीवन बिताते थे, तो इन्हीं के अनुसार चलते थे। पर अब तुम भी इन सब को अर्थात् क्रोध, रोष, बैरभाव, निन्दा और मुंह से गालियां बकना ये सब बाते छोड़ दो। एक दूसरे से झूठ मत बोलो क्योंकि तुम ने पुराने मनुष्यत्व को उसके कामों समेत उतार डाला है। और नए मनुष्यत्व को पहिन लिया है जो अपने सृजनहार के स्वरूप के अनुसार ज्ञान प्राप्त करने के लिये नया बनता जाता है। याकूब 4:4 – हे व्यभिचारिणियो, क्या तुम नहीं जानती, कि संसार से मित्रता करनी परमेश्वर से बैर करना है? सो जो कोई संसार का मित्र होना चाहता है, वह अपने आप को परमेश्वर का बैरी बनाता है। याकूब 4:7-8 – इसलिये परमेश्वर के आधीन हो जाओं; और शैतान का साम्हना करो, तो वह तुम्हारे पास से भाग निकलेगा। परमेश्वर के निकट आओ, तो वह भी तुम्हारे निकट आएगा; हे पापियों, अपने हाथ शुद्ध करो; और हे दुचित्ते लोगो अपने हृदय को पवित्र करो। मसीही जीवन में स्वयं के साथ मेल से रहने की आवश्यकता - - इसके द्वारा ही हम परमेश्वर के पुत्र ठहर सकते हैं। - इसके द्वारा ही हम दुविधा की स्थिति से बच सकते हैं। - इसके द्वारा हम ग़लत निर्णयों, ग़लत, संगति, ग़लत कार्यो और ग़लत सम्बन्धों से बच सकते हैं। 2. जो दूसरे मनुष्यों के साथ मेल से रहे और जो दूसरे मनुष्यों के बीच मेल कराए। 1 यूहन्ना 4:8 - जो प्रेम नहीं रखता, वह परमेश्वर को नहीं जानता, क्योंकि परमेश्वर प्रेम है। फिलिप्पियों 2:2-5 – तो मेरा यह आनन्द पूरा करो कि एक मन रहो और एक ही प्रेम, एक ही चित्त, और एक ही मनसा रखो। विरोध या झूठी बड़ाई के लिये कुछ न करो पर दीनता से एक दूसरे को अपने से अच्छा समझो। हर एक ही अपनी ही हित की नहीं, बरन दूसरों की हित की भी चिन्ता करे। जैसा मसीह यीशु का स्वभाव था वैसा ही तुम्हारा भी स्वभाव हो। हम मनुष्यों के साथ मेल के साथ कैसे रह सकते हैं? 1. समझदारी से चलें। धीरज धरें। उतावली न करें। छोटी छोटी बातों को प्रतिष्ठा व हठ का कारण न बनाएं। 2. क्षमा के द्वारा अपने हृदय में क्रोध, जलन, ईर्ष्या, निन्दा, प्रतिशोध, छल, कपट, घृणा, षडयंत्र आदि को बिल्कुल भी न पनपने दें। 3. अपनी वाणी पर काबू रखें। एक दूसरे की बुराई न करें। इधर की बात उधर न लगाएं। जले पर नमक न छिड़कें। सभी मनुष्यों के साथ सामान्य सम्बन्ध बनाए रखने का यथासंभव प्रयास बिना दूसरे से अपेक्षा किए स्वयं करें। 4. मेल करने के लिए पहल करने पीछे न हटें। यदि हम दूसरे से इस बात की पहल की अपेक्षा करते रहेंगे तो समय के साथ दूरियां ही बढ़ेगी। विरोधी की सारी क्रियाओं प्रतिक्रियाओं में हमें खोट ही दिखाई देगा। उसके प्रति हमारे हृदय का आक्रोश बढ़ता ही जाएगा। पहल करने के लिये बाइबिल में स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि यदि तेरा बैरी भूखा हो तो उसे भोजन करा, यदि वह प्यासा हो तो उसे पानी पिला, उसके लिए प्रार्थना कर, उसे नमस्कार कर और उसे सात के सत्तर गुना क्षमा कर अर्थात् जितनी बार तेरे हृदय में उसके विरोध में कड़वाहट उत्पन्न हो उतनी बार तू उसे क्षमा करता ही जा। केवल इसके द्वारा ही तू उसके नियंत्रण से आज़ाद हो सकेगा नहीं तो वह ही तेरे सारे सोच-विचार, क्रियाओं-प्रतिक्रियाओं के केन्द्र बना रहेगा। - स्वार्थी और आत्मकेन्द्रित न बनें दूसरों के हित का भी ध्यान रखें। मसीही जीवन में दूसरे मनुष्यों के साथ मेल से रहने की आवश्यकता- - इसके द्वारा ही हम परमेश्वर की आशीषों के पात्र ठहरेंगे। - यह परमेश्वर का आदेश हैं विकल्प नहीं। रोमियों 12:17-18 – बुराई के बदले किसी से बुराई न करो; जो बातें सब लोगों के निकट भली हैं, उन की चिन्ता किया करो। जहां तक हो सके, तुम अपने भरसक सब मनुष्यों के साथ मेल मिलाप रखो। 1 यूहन्ना 3:10 – इसी, से परमेश्वर की सन्तान, और शैतान की सन्तान जाने जाते हैं; जो कोई धर्म के काम नहीं करता, वह परमेश्वर से नहीं, और न वह, जो अपने भाई से प्रेम नहीं रखता। - इसके द्वारा ही हम सच्चे मसीही ठहरेंगे। 1 यूहन्ना 4:20 – यदि कोई कहे, कि मैं परमेश्वर से प्रेम रखता हूं; और अपने भाई से बैर रखे; तो वह झूठा है: क्योंकि जो अपने भाई से, जिसे उस ने देखा है, प्रेम नहीं रखता, तो वह परमेश्वर से भी जिसे उस ने नही देखा, प्रेम नहीं रख सकता। - इसके द्वारा ही शान्ति, सन्तुष्टि और आनन्द से भरा जीवन सम्भव होगा। 3. जो सच्चे परमेश्वर के साथ मेल से रहे। मसीही जीवन में आवश्यकता - - इसके बिना परमेश्वर से मेल सम्भव है ही नहीं। - इसके बिना न ही इस जीवन में कोई अर्थ है, न ही जीवन की कोई उपयोगिता और न ही अनन्त जीवन की कोई निश्चितता है। 4. जो मनुष्यों का परमेश्वर के साथ मेल कराए। - इसके लिए हमें दूसरों के लिए प्रार्थना करना है। - हमें स्वयं के जीवन का ऐसा उदाहरण रखना है जिससे प्रभु यीशु मसीह की शोभा प्रगट हो और हम ठोकर का नहीं परन्तु गवाही का करण बन सकें। - हमें प्रभु यीशु मसीह के अन्तिम महानतम आदेश को पूरे लगन, समर्पण, तन-मन व धन के साथ सक्रियता से पूरा करना है। मत्ती 28:19 – इसलिए तुम जाकर सब जातियों के लोगों को चेला बनाओं और उन्हें पिता और पुत्र और पवित्रात्मा के नाम से बपतिस्मा दो। रोमियों 10:13-15 – क्योंकि जो कोई प्रभु का नाम लेगा, वह उद्धार पाएगा। फिर जिस पर उन्होंने विश्वास नहीं किया, वे उसका नाम क्योंकर लें? और जिस की नहीं सुनी उस पर क्योंकर विश्वास करें? और प्रचारक बिना क्योंकर सुनें? और यदि भेजे न जाएं, तो क्योंकर प्रचार करें? जैसा लिखा है, कि उन के पांव क्या ही सुहावने हैं, जो अच्छी बातों का सुसमाचार सुनाते हैं। यशायाह 52:7- पहाड़ों पर उसके पांव क्या ही सुहावने हैं जो शुभ समाचार लाता है, जो शान्ति की बातें सुनाता है और कल्याण का शुभ समाचार और उद्धार का सन्देश देता है, जो सिय्योन से कहता है, तेरा परमेश्वर राज्य करता है। - हम सब पतरस और पौलुस के समान नहीं बन सकते परन्तु अन्द्रियास के समान हम सभी बन सकते हैं कि उसके समान हम लोगों का सम्बन्ध परमेश्वर से, उसकी कलीसिया से और उसके वचन से कराने का प्रयास करें (प्रभु यीशु मसीह के शिष्य पुस्तक से अन्द्रियास के विषय में जानकारी हासिल करें)। मनुष्यों का परमेश्वर के साथ मेल कराने की मसीही जीवन में आवश्यकता – - इसके द्वारा हम परमेश्वर की आशीषों के पात्र ठहरेंगे। - इसके द्वारा हम परमेश्वर के पुत्र ठहराए जाएंगे। - इसके द्वारा हम परमेश्वर के महानतम आदेश को पूरा करने वाले ठहरेंगे। - इसके द्वारा हम अनेक भटकी हुई आत्माओं को अनन्त विनाश का भागीदार होने से बचा सकेंगे। - जब हमारा ध्यान लोगों का मेल परमेश्वर से कराने की ओर होगा तो हम जीवन की बहुत सी शैतानी, सांसारिक और नकारात्मक बातों से दूर रहेंगे। जब हम अपना ध्यान लड़ाई झगड़े की ओर नहीं किन्तु मेल करने की ओर केन्द्रित करेंगे तो हम वास्तव में धन्य अर्थात् आशीषित, आनान्दित व सन्तुष्ट ठहरेंगे।
|



