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आत्मिक जीवन के लिए आदर्शः पौलुस PDF Print E-mail
Written by लेखक मण्‍डल   
Friday, 23 October 2009 13:18
आत्मिक जीवन के लिए आदर्शः पौलुस  

‘‘जब मैं निर्बल होता हूं, तभी बलवन्‍त होता हूं’’। (2कुरिन्थियों 12:10)

पौलुस के जीवन का परिवर्तन आश्‍चर्यजनक है। दमिश्‍क के मार्ग पर प्रभ यीशु के दिव्‍य दर्शन के पश्‍चात् वह सदैव यीशु के लिए ही जिया। अपने उद्धारकर्त्ता की सेवा में उसने तीव्रता से कार्य किया। उसने 5 देशों की यात्रा की, 27 कलीसियाओं की स्‍थापना की और नया नियम की 14 पुस्‍तकें लिखी।

परन्‍तु पौलुस की जीवन यात्रा बहुत आसान नहीं रही। अनेकों बार उसे जेल में डाला गया, कोड़ो की मार सहना पड़ी। समुद्री यात्रा के जोखिमों, पत्‍थरवाह किये जाने और अनेक पीड़ाओं से होकर उसको गुज़रना पड़ा।

इस संदर्भ से पहले ग्‍यारवें अध्‍याय में पौलुस अपने जीवन में आई समस्‍याओं और कठिइयों के विषय में वर्णन करता है, परन्‍तु अपने इस वाक्‍य में वह इन बातों के लिए परमेश्‍वर को धन्‍यवाद देता है क्‍योंकि वह जानता था कि जीवन की कठिनाइयों में भी परमेश्‍वर उसके जीवन को अपनी महिमा के लिए इस्‍तेमाल कर रहा है। पौलुस के जीवन की समस्‍याओं से बढ़कर उसके लिए परमेश्‍वर की सेवा प्रमुख थी। उसकी प्राथमिकता परमेश्‍वर का कार्य थी।

आज हम विचार करें, कहीं जीवन की कठिनाइयों का सामना करते हुए हमने अपनी दृष्टि परमेश्‍वर की ओर से हटा तो नहीं ली है। यदि हम पौलुस के जीवन की ओर देखें तो हम भी उसके समान कह सकेंगे ‘‘जब मैं निर्बल होता हूं, तभी बलवंत होता हूं’’।

प्रार्थनाः- हे प्रभु, हमें अपनी योजनाओं में शामिल कर कि हम अपनी समस्‍याओं से बढ़कर तेरे वचन के प्रचार को प्रमुखता दे सकें। आमीन।
 
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