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मसीही विश्‍वास के शत्रु PDF Print E-mail
Written by रेव्‍ह.जे.एन. मनोकरन   
Saturday, 17 March 2007 21:39

मसीही जीवन का आधार ही विश्‍वास है। विश्‍वासी जीवन स्‍वयं में एक सुखद अनुभव है। हबक्कूक भविष्‍यवक्‍ता का कथन है ‘‘........ परन्‍तु धर्मी अपने विश्‍वास के द्वारा जीवित रहेगा’’ (हबक्‍कूक 2:4)। किन्‍तु हमारा अनुभव बतलाता है कि अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर मसीहियों के जीवन में मसीही विश्‍वास का अभाव है। मसीही विश्‍वास का ग्राफिक आधार बड़े उतार-चढ़ावों से भरा दिखता है। उसके जीवनों में पर्वत शिखरों और गहरी घाटियों के समतुल्‍य अंधकार व्‍याप्‍त है। विश्‍वास का यह उतार चढ़ाव स्‍वयं प्रभु यीशु के शिष्‍यों ने भी अनुभव किया था, कम से कम ऐसे तीन उदाहरण तो हम पाते ही हैं जो कि प्रभु यीशु ने अपने शिष्‍यों से अस्थिर या डगमग विश्‍वास के विषय में कहे हैं। हम यदि उन तीन घटनाओं का सतर्कता पूर्वक अध्‍ययन करें तो हम विश्‍वास के शत्रुओं को पहचान सकेंगे और उनका निराकरण भी कर सकेंगे। ये तीनों घटनाएं मत्‍ती रचित सुसमाचार में दर्ज पाई जाती हैं। (मत्‍ती 6:30, 8:26 और 14:31)

1. चिंता:- पर्वत के उपदेश के अंतिम चरण में हम प्रथम बार इसे (चिंता) पाते हैं। इसमें प्रभु यीशु अपने शिष्‍यों को सिखलाते हैं कि भोजन से कहीं ज्‍य़ादा आवश्‍यक आपका जीवन है और वस्‍त्रों से अधिक ज़रूरी है आपका शरीर। हम क्‍या खायेंगे, क्‍या पियेंगे और क्‍या पहनेंगे, यह चिन्‍ता इसलिए होती है क्‍योंकि हमारा विश्‍वास अपने परम पिता परमेश्‍वर में नहीं होता। हमें उसके प्रावधानों में यकीन नहीं रहता और हमें उसकी प्रतिज्ञाओं पर भरोसा नहीं होता। चिंता विश्‍वास की प्रथम नंबर की शत्रु है।

‘चिंता’ करना पाप की श्रेणी में आता है। रोमियों 14:23 के अनुसार और जो कुछ विश्‍वास से नहीं वह पाप है। विश्‍वास एक आत्मिक अनुभूति है, जो कुछ भी हम परमेश्‍वर के अनुग्रह से प्राप्‍त करते हैं उसे विश्‍वास और कृतज्ञतापूर्वक ग्रहण करना चाहिए। चिन्‍ता एक ऐसा विचार है जो हमें परमेश्‍वर में यकीन करने अथवा उसके प्रेम को स्‍वीकारने या उसकी प्रतिज्ञाओं को मानने में बाधा उत्‍पन्‍न करता है।

अक्‍सर हम कई कार्यालयों, दुकानों एवं घरों में लिखा हुआ यह लोकप्रिय वाक्‍य देखते हैं Don’t Worry It May Never Happen अर्थात ‘चिन्‍ता न करो- ऐसा कभी नहीं होगा’ यह वास्‍तव में सत्‍य बात है क्‍योंकि चिन्‍ता तो मात्र एक कल्‍पना होती है जिसका यथार्थ से कुछ लेना-देना नहीं होता। कई बार जिन बातों की हम आशंका करते हैं, वे कभी नहीं गुज़रतीं। वे वास्‍तव में व्‍यर्थ की अवधारण ही होती है जो कि मात्र कल्‍पना के अलावा कुछ भी नहीं होती।

चिंता हमें निष्क्रिय बना देती है। इनके द्वारा हमारा मस्तिष्‍क एवं अन्‍य अवयव कुण्ठित हो जाते हैं। चिंता से जुड़ी एक घटना मैं प्रस्‍तुत करना चाहता हूं जो मार्टिन लूथर से संबंधित एक दिलचस्‍प वाकया है। एक दिन वे बहुत ही निराश थे। यहां तक कि उस दिन उन्‍होंने किसी से भी न कोई बात की और न ही मिले ही। वे सारे दिन अपने बिस्‍तर पर ही करवटें बदलते रहे। उनकी पत्‍नी जो कि उनकी इस दशा से संवेदना रखे थी और उनकी मदद करना चाहती थी। उन्‍होंने एक उपाय सोचा। स्‍वयं को उन्‍होंने शोक सूचक काले वस्‍त्रों में ड्रेस अप कर मार्टिन लूथर के कमरे में प्रवेश किया। उन्‍हें शोक सूचक कपड़ों में देखकर मार्टिन लूथर ने बड़े कौतूहल से पूछाः ‘‘अरे। यह क्‍या? कौन मर गया है?’’ उनका जवाब था – ‘‘परमेश्‍वर मर गया है’’। इतना कहकर वे वहां हटकर अन्‍य कमरे में चली गयीं। इस कथन ने मार्टिन लूथर के दिमाग को झकझोर दिया। उनके मन में तुरंत यह विचार कौंधा – ‘‘मेरा परमेश्‍वर तो जीवित परमेश्‍वर है – तो फिर मुझे चिंतित होने का प्रश्‍न ही नहीं उठता।’’ वे फ़ौरन बिस्‍तर से उठ बैठे और उन्‍होंने स्‍वयं को तरोताज़ा किया। क्‍योंकि वे समझ चुके थे कि परमेश्‍वर ही हमारे जीवन का दाता (सम्राट) है, वही हमें चलाता है।

विलियम बार्कले अपने एक वृतांत में लिखते हैं कि ‘‘चिंता तो एक अंधी सोच है जिसका प्रकृति से कोई सामंजस्‍य नहीं। प्रकृति हमें इस बात की शिक्षा देती है कि परमेश्‍वर अपनी सृष्टि से कितना प्रेम करता है और उसको पूरा संरक्षण और सुरक्षा प्रदान करता है। चिंता हमें इतिहास से कुछ सीखने भी नहीं देती। परमेश्‍वर के वचन और कलीसियाई इतिहास में ऐसे अनगिनत उदाहरण भरे पड़े हैं, जहां कि परमेश्‍वर ने अपने लोगों के माध्‍यम से अनेकों महान कार्य किये हैं। चिंता के मारे हम स्‍वयं के जीवनों से भी कुछ अच्‍छाई सीखने नहीं पाते। प्रायः प्रत्‍येक मसीही ने कई बार परमेश्‍वर द्वारा किये गये अनुग्रहों को महसूस किया हुआ होता है किंतु चिंता उन सभी वरदानों को अनदेखा करा देती है।’’

श्री मैथ्‍यू हेनरी कहते हैं ‘‘आध्‍यात्मिक चिंतन ही सांसारिक चिंतन से छुटकारे की दया है’’। इस समस्‍या का निराकरण तब ही संभव है कि जब हम अपनी प्राथमिकताओं को एक नयी दृष्टि से संवारें। सबसे पहले परमेश्‍वर की महिमा को स्‍थान दें, उसकी भलाई को उसके बाद ही महत्‍व देना चाहिए। किंतु अधिकांश मसीही पहले उसकी भलाई की ओर ध्‍यान देते हैं ताकि वह हम पर अनुग्रह करता रहे। जबकि प्रभु की आज्ञा है कि हम परमेश्‍वर की ‘महिमा’ को ही प्राथमिकता दिया करें।

हमें अपनी व्‍यक्तिगत चिंताओं, पारिवारिक चिंताओं का बोझ, चाहे वह वर्तमान में हों अथवा भविष्‍य की हों – को प्रभु यीशु को समर्पित कर देना चाहिए जो कि हमारी आत्‍माओं के बोझ को वहन करने वाला हमारा मुक्ति दाता है। हमें परमेश्‍वर से प्रार्थना करते हुए अपनी चिंताओं (आवश्‍यकताओं को) प्रस्‍तुत करते हुए परमेश्‍वर की शांति का आनंद उठाना चाहिये जो कि बदले में हमें समझ (बुद्धि‍) प्रदान करता है।

2. डर या भयः- एक दूसरा वृतांत हम मत्‍ती रचित सुसमाचार के आठवें अध्‍याय में पाते हैं। गलील की झील में एक नाव पर प्रभु यीशु और उनके शिष्‍य यात्रा कर रहे हैं। यह झील अचानक उठने वाले तूफानों के लिए जानी जाती है। इसमें कई दुर्घटनाएं घटीं हैं और यहां तक कि कई लोग मृत्‍यु के शिकार भी हो चुके हैं। प्रभु यीशु गहरी निद्रा में लीन हैं। शिष्‍यगण संभवतः ठंडी हवा के झोकों का आनंद लेते हुए बतिया रहे हैं। अचानक एक अनुभवी मछुआरा शिष्‍य प्रचंड तूफान आने की आशंका से भयभीत हो उठता है क्‍योंकि उसे पूर्व में ऐसे कई अनुभवों से गुज़रना पड़ा होगा। सभी शिष्‍य इस खतरे से घबरा उठते हैं और जबकि तूफानी लहरें उनकी नाव पर थपेड़े मारने लगती हैं तो वे अत्‍यंत भयभीत हो चिल्‍ला पड़ते हैं।

संभवतः उन शिष्‍यों में कई तरह के ख्‍याल उभरे हों। मृत्‍यु का भय तो सब ही पर हावी हो रहा था। वे यह भी सोच रहे होंगे अरे! हमारे तो घर परिवार हैं। पतरस सोच रहे होंगे मेरी पत्‍नी और बच्‍चों का क्‍या होगा। उन्‍होंने ये भी सोचा होगा अरे! गुरू (प्रभु यीशु) का क्‍या। ये तो कुंआरे ठहरे। आगे नाथ न पीछे पगहा। इनको किसकी फिक्र, तब ही तो बड़ी गहरी नींद में तल्‍लीन है। इस प्रकार भय ने व्‍याप्‍त होकर उनके विश्‍वास को तोड़ डाला था। भय और विश्‍वास कदापि सहयात्री नहीं हो सकते। दोनों एक दूसरे के प्रतिपक्षी होते हैं। अतः उन्‍होंने प्रभु को झकझोर कर जगा दिया था।

जब प्रभु जागे और उन्‍होंने तूफान को शांत कर दिया तो उन्‍होंने शिष्‍यों से पूछा – क्‍यों डरते हो? यह घटना इस तथ्‍य की साक्षी है कि डर या भय विश्‍वास का दूसरा बड़ा शत्रु है।

डर भी व्‍यक्ति को निष्क्रिय बना देता है। जब किसी व्‍यक्ति पर डर हावी हो जाता है तो वह सामान्‍य (NORMAL) नहीं रह जाता। डर की दिशा में वह न तो सही सोच पाता है, न सुन पाता है और न ही देख पाता है। डर उस व्‍यक्ति को व्‍यथित करके मुसीबत में डाल देता है।

डर, वह हमारी दृष्टि को भी भ्रमित कर देता है। यह दृष्टिभ्रमित आंतरिक (आत्मिक) और बाह्य (शारीरिक) दोनों ही प्रकार की होती है। यही कारण था कि डर के मारे शिष्‍यों ने प्रभु यीशु का दर्शन एक ‘‘प्रेतात्‍मा’’ के रूप में किया। उसी प्रकार मरियम ने भी भयवश ही प्रभु को एक माली ही समझा था। उसी प्रकार वर्तमान समय में भी हम मसीही लोग अल्‍पसंख्‍यक या लघुता जैसी मनोभावना या हीनभावना का शिकार होते रहते हैं जिसका मुख्‍य कारण असुरक्षा (भय) ही तो है।

भय के कारण हम परमेश्‍वर द्वारा किये जा रहे अद्भूत कार्यों को भी नहीं देख पाते। यहां तक कि दुख-बीमारी, दैनिक समस्‍याओं, कठिनाइयों और विपत्तियों में भी हम परमेश्‍वर की उपस्थिति को नज़र अंदाज़ कर जाते हैं। प्रभु का नाम ही ‘इम्‍मानुएल’ है अर्थात ‘‘परमेश्‍वर हमारे साथ’’ – किंतु यह तथ्‍य भय के कारण हम भुला बैठते हैं। हम उसे पहचान नहीं पाते, उसके कार्यों को हम समझ नहीं पाते।

डर या भय कई प्रकार का हो सकता है। एक सर्व मान्‍य डर है ‘मृत्‍यु का भय’। एलिय्याह अपने प्राणों के भय से भागा था। ग़ैर मसीहियों में कई अज्ञात किस्‍म के भय व्‍याप्‍त होते हैं। यही कारण है कि अंजाने भय से वशीभूत होकर वे प्रेतपूजा का सहारा लेने लगते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में प्रेत बाधा का भय प्रायः बहुतायत से विद्यमान है। भविष्‍य की चिंता या भय का सोच आधुनिक युवाओं व युवतियों में आज स्‍पष्‍ट नज़र आ रहा है।

तो हमारे पास भय से बचने का कोई विरोधी उपाय क्‍या हो सकता है? आइये हम 2 तीमुथियुस 1:7 पर ध्‍यान दें: ‘‘क्‍योंकि परमेश्‍वर ने हमें भय की नहीं पर सामर्थ्‍य और प्रेम, और संयम की आत्‍मा दी है।’’

संत पौलुस स्‍पष्‍ट रूप से संकेत करते हैं कि भय से मुक्‍त रहने का सिर्फ एक ही उपाय है कि हम प्रभु यीशु में विचरते हुए पवित्र आत्‍मा की अगुवाई में जीवन बिताएं। जो कोई परमेश्‍वर के भय में स्थिर रहता है उसे किसी मनुष्‍य या अन्‍य किसी वस्‍तु में भयभीत होने का प्रश्‍न ही नहीं उठता। जहां तक कि मृत्‍यु का भय है, उससे तो प्रभु ख्रीष्‍ट ने हमें मुक्‍त कर ही दिया है। इस बात की पुष्टि इब्रानियों 2:14,15 से होती है।

3. शक या संदेहः- मसीही विश्‍वास को तोड़ने के लिए शैतान जिस तीसरे शक्तिशाली अस्‍त्र का प्रयोग करता है, वह हैः शक या संदेह। यही वह अचूक अस्‍त्र था जिसका दुरूपयोग उसने अदन की वाटिका में किया था। और इसी अस्‍त्र का प्रयोग उसने प्रभु यीशु पर भी परीक्षा लेने वश किया था। मत्‍ती रचित सुसमाचार के 14 अध्‍याय में दर्ज घटना इस तथ्‍य पर पूर्ण प्रकाश डालती है। जब शिष्‍यों ने प्रभु यीशु को सागर की लहरों पर चलते देखा तो डर के मारे उन्‍होंने प्रभु यीशु को भूत-प्रेत समझा। उन्‍होंने सोचा शायद उनका ही कोई मछुआरा साथी, जो कभी मर चुका था, प्रेतात्‍मा के रूप में हमारी नाव की ओर बढ़ा चला आ रहा है।
प्रभु ने उनसे कहा, ‘‘डरो मत’’ किंतु तब भी शिष्‍य उसकी आवाज़ को पहचान न सके। अतः ‘संदेह’ करते हुए पतरस ने कहा यदि यह यीशु ही है तो मैं भी लहरों पर चलना चाहता हूं। पतरस लहरों पर चलता हुआ आगे बढ़ता है और ज्‍यों ही वह कुछ दूर जाता है तो सोचता है अगर यह यीशु ही है तो समुद्र को शांत हो जाना चाहिये था (मत्‍ती 8)। मगर प्रचंड लहरें तो अब भी उठ रही हैं, वह इस संदेह का शिकार हुआ – विश्‍वास टूटा और वह डूबने लगा। वह बचाने के लिए चिल्‍लाने लगा तो प्रभु ने उसे बचाया और प्रभु ने पतरस से पूछा कि, उसने संदेह क्‍यों किया? विश्‍वास का स्‍थान जब संदेह ने ले लिया था तो पतरस पानी पर चलने में असफल रहा था। इसी प्रकार से संदेह ग्रस्‍त मसीही विश्‍वास से दूर हो जाते हैं। फलस्‍वरूप उनका जीवन, मसीह रहित होकर असफलता के गर्त में पड़ जाता है।

पांच हज़ार की भीड़ को भोजन से तृप्‍त किये जाने की घटना में भी हम विश्‍वास को ही पाते हैं। यदि बांटी जाने वाली रोटियां के लिये कोई व्‍यक्ति संदेह करता तो निश्‍चय ही वह भोजन के तृप्‍त होने के आनंद का भागीदार कतई न बन पाता। संदेह से हम परमेश्‍वर की आशीष से वंचित रह जाते हैं।

इसीलिये तो प्रभु ने कहा है कि यदि तुम्‍हारा विश्‍वास राई के दाने के बराबर भी है तो तुम कई बड़े (महान) कार्य कर सकते हो। बशर्ते कि उसमें संदेह का किंचित मात्र भी समावेश न हो। इसीलिये तो याकूब अपनी पत्री में कहते हैं कि जो कुछ मांगा जाये वह संदेह से परे विश्‍वास से मांगा जाये (याकूब 1:6 के अनुसार)। संदेह करने वाला व्‍यक्ति उस लहर के समान है जो महज़ हवा के झोकें सी उठती है और ऐसा व्‍यक्ति किसी उत्‍तम उपलब्धि की आशा नहीं कर सकता।

जिस प्रकार से प्रकाश की निरंतरता में बढ़ोत्‍तरी होने पर छाया लोप हो जाती है, उसी प्रकार विश्‍वास की गहनता के बढ़ जाने पर संदेह भी गायब हो जाता है। प्रभु के शिष्‍यों को इस तथ्‍य का ज्ञान था अतः वे स्‍वयं के विश्‍वास की प्रगति के लिये सदैव प्रार्थना करते रहते थे। (लूका 17:5 के अनुसार)

परमेश्‍वर का वचन सुनने से भी हमारा विश्‍वास दृढ़ता पाता है (रोमियों 10:17 देखें)। दूसरा तथ्‍य यह भी है कि हमारा केन्‍द्र बिन्‍दु परमेश्‍वर होना चाहिये न कि हम अपना ध्‍यान अपनी परिस्थितियों पर लगाएं। पतरस ने अपना ध्‍यान प्रभु यीशु पर से हटा कर लहरों पर कर दिया था क्‍योंकि उसके मन में शंका ने घर कर लिया था। अतः वह असफल (डूबने) होने लगा था। हमें इस घटना से सीखना चाहिये।

निष्‍कर्ष – इस प्रकार हम देखते हैं कि प्रभु यीशु के ही शब्‍दों में विश्‍वास के प्रमुख शत्रु हैं – चिंता, भय और संदेह। आइये हम पवित्र वचन के माध्‍यम से स्‍वयं की जांच करें कि हमारी क्‍या-क्‍या कमज़ोरियां हैं, जो हमारे मसीही विश्‍वास के आड़े आती हैं। हम उन्‍हें दूर करें और परमेश्‍वर की असीम आशीषों को प्राप्‍त करें। उसके अनुपम अनुग्रह का आनंद लें ताकि हम भी प्रेरित पौलुस की भांति कह सकें कि हमने विश्‍वास के साथ अच्‍छी लड़ाई लड़ी है।

रेव्‍ह.जे.एन. मनोकरन

Last Updated on Thursday, 20 March 2008 16:20
 
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