| पांचवीं बात – बाइबिल |
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| Written by श्री जे.आर. हार्टर | |||
| Saturday, 17 March 2007 21:33 | |||
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यद्यपि बाइबिल के सम्बन्ध में विश्वासियों के विचार सदा एक से नहीं होते फिर भी कुछ ऐसी बातें हैं जिन पर विश्वास करना आवश्यक है। हमें उसे अविश्वासी ही समझना पड़ेगा जो इन बातों को नहीं मानता – 1. बाइबिल के लेखक परमेश्वर की ओर से लिखते थे। (2 पतरस 1:21) बाइबिल के बारे में आप हज़ार भिन्न-भिन्न विचार रख सकते हैं अथवा अज्ञान रहें परन्तु कम से कम आप को ऊपर की छः बातों को मानना ही पड़ेगा नहीं तो आप नाश हो जाएंगे। कुछ अच्छे लोग तथा विद्वान मिलते हैं जो बाइबिल को नहीं मानते हैं, क्यों? अविश्वास का मूल कारण यह निकलता है कि वे परमेश्वर को नहीं मानते कि वह सर्वशक्तिमान है। परमेश्वर की शक्ति को न जानकर वे आर्श्चकर्मों को नहीं मान सकते हैं। बाइबिल आर्श्चकर्मों से भरी हुई है और ख़ुद एक आर्श्चकर्म है। जो आश्चर्यकर्म को नहीं मानता वह भविष्यवाणी, प्रेरणा तथा प्रेरिताई को नहीं मान सकता है। वह पवित्र आत्मा को तथा यीशु की परमेश्वरत्व को नहीं मानता। चर्च के दो प्रसिद्ध ‘‘क्रीड’’ याने विश्वास – पात्र होते हैं, एक प्रेरितों का कहलाता है और दूसरा नैसीन कहलाता है। न उसमें न इसमें कोई वाक्य है कि मैं बाइबिल पर विश्वास करता हूं। न होने का एक कारण यह हो सकता है कि आरम्भ में बाइबिल विवादित नहीं थी। उन दिनों में धर्मशास्त्र को सब मानते थे, परन्तु ‘‘क्रीड’’ में यह बात न होने के कारण से कलीसिया में बहुत से अविश्वासी घुस गये जो बाइबिल पर विश्वास नहीं रखते हैं तथा इस अविश्वास के कारण से कलीसिया में बड़ी कमज़ोरी पड़ गई। कुछ और लोग हैं जिनका विश्वास आवश्यकता से अधिक कट्टर है। उनका विचार लगता है मानो कि यीशु उर्दू में बोला और प्रेरितों ने हिन्दी में छापा। आरामदेह विश्वास है यह। खुश हैं वे अनपढ़ जो इस ज्ञान से बाहर रहे कि बाइबिल किन कारणों से हमारे पास आई। इब्रानियों 1:1 यह भी प्रमाणित करता है कि परमेश्वर की प्रेरणा की रीतियां भिन्न-भिन्न थीं, पूर्व युग में परमेश्वर ने बाप दादों से थोड़ा-थोड़ा करके और भांति भांति से भविष्यवक्ताओं के द्वारा बातें करके ...... । कट्टर विश्वासियों से भी गड़बड़ और हानि होती रही। रोमन कैथोलिक चर्च परमेश्वर की प्रेरणा को तो मानती है परन्तु बाइबिल से अधिक चर्च को महत्व देती है। उनका कहना यह है कि चर्च ने बाइबिल को बनाया, बाइबिल ने चर्च को नहीं बनाया। उनका और भी तर्क-वितर्क है जो प्रभावित है। उनका अर्थ यह होता है कि जब चर्च का नियम बाइबिल से लड़ता है तो चर्च के नियम को मानना है। यदि यह बात सच है कि बाइबिल से अधिक रोमन कैथोलिक चर्च का अधिकार है तब असली चर्च वह है और अन्य सब चर्च नकली है। या क्या प्रकाशित वाक्य में रोमन कैथोलिक चर्च का कोई और वर्णन है? बाइबिल परमेश्वर का वचन है और मार्टिन लूथर के समान विश्वासी कहेगा कि धर्मशास्त्र हमारा अधिकार है। फिर भी हर एक मसीही को अपने लिये इस मुख्य सवाल का जवाब देना पड़ेगा कि आप पोप की आज्ञा को मानेगें अथवा बाइबिल की आज्ञा को? बाइबिल की आज्ञाओं को मानना इतना आसान नहीं है जितना चर्च की आज्ञाओं को मानना। स्थानीय फ़ादर को खुश करना इतना कठिन नहीं है जितना स्वर्गीय पिता को प्रसन्न करना कठिन होता है। यदि आप चर्च के थोड़े साधारण नियमों का पालन करेंगे तो फ़ादर सन्तुष्ट होगा परन्तु परमेश्वर आप के दिल को बदलना चाहता है। जब हम बाइबिल के अधिकार को मानते हैं तब हम – 1. गम्भीरता से बाइबिल का अध्ययन करेंगे, THE B-I-B-L-E : श्री आर. हार्टर
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| Last Updated on Thursday, 20 March 2008 16:21 |



