| दहेज की लपटें और मसीही परिवार |
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| Written by श्रीमती अनीता जोज़फ | |||
| Saturday, 17 March 2007 21:30 | |||
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दहेज भारतीय समाज की एक ज्वलन्त समस्या है। हज़ारों युवतियां हर वर्ष दहेज की बलि चढ़ायी जाती हैं। प्राण नहीं लिये गये तो पल-पल उनको त्रसित किया जाता है। गालियां दे-दे कर विष घोला जाता है। विवाह का सुन्दर-सुहावना-स्वप्न पल भर में ही नारकीय वास्तविकता में बदल जाता है। दहेज की प्रथा का सबसे भयानक पहलू है – कन्या भ्रूणों की मार्मिक हत्या। आज हमारे देश में प्रति दस सेकेण्ड में होने वाली एक कन्या भ्रूण की हत्या के पीछे दहेज का क्रूर दानवी पन्जा ही है। मसीही समाज भी अब दहेज समस्या से अछूता नहीं रहा है। मसीही संगतियों में स्वर्गदूतों का आचरण करते हमारे मसीही बंधु, बहुधा विवाह सम्बंधों के मामलों में दुष्ट-दूतों की भूमिका करते दिखाई पड़ते हैं। पृष्ठ भूमि – प्राचीन भारत में स्त्री धन के रूप में पिता की ओर से कन्या को विवाह के समय आभूषण, वस्त्र व अन्य गृह उपयोगी सामान दिये जाते थे, जो पिता-माता के कन्या के प्रति प्रेम के प्रतीक थे। बाद में उपभोक्तावाद के प्रसार के साथ-साथ लोगों ने इसे व्यापार-प्रसार का अस्त्र बना लिया और विवाह धन के आधार पर निश्चित होने लगे। 70 से 90 दशक तक आते-आते यह एक दानवी शिकंजा बन गया। दहेज की रकमें निर्धारित होने लगी, सामान की फेहरिस्तें दी जाने लगीं और वधु पक्ष को दहेज के लिये वधुओं को सताया, जलाया और मारा जाने लगा। यह सिलसिला आज भी जारी है। दुःख इस बात का है कि मसीही धर्म में दहेज का कोई आधार न होते हुये भी इसे सहर्ष अपना लिया गया। मसीही धर्म में दहेज की कुप्रथा को पलने-बढ़ने का जो अवसर मिला है उसके पीछे निजी स्वार्थ, लोभ, पवित्रशास्त्र की अज्ञानता व अगुवों द्वारा इस विषय में उचित शिक्षा का न दिया जाना कुछ मुख्य कारण है। पवित्र शास्त्र के अनुसार विवाह में उपहार वधु पक्ष को दिये जाने चाहिए। ‘‘उसने यहोवा के सम्मुख भूमि पर झुककर प्रणाम किया। उस सेवक ने सोने चांदी के आभूषण तथा वस्त्र निकाल कर रिबका को दिये, उसके भाई और माता को भी उसे बहुमूल्य वस्तुएं दीं’’ (उत्पत्ति 24:53)। स्पष्ट है मसीही विवाह में वर-पक्ष को दहेज दिये जाने का कोई प्रावधान नहीं है। यदि उपहार दिया ही जाना है तो उपरोक्त पवित्रशास्त्रीय उदाहरण के अनुसार वधु को जीवन-संगिनी के प्रति प्रेम के प्रतीक के रूप में और वधु के सम्मान के रूप में दिया जाना चाहिए। दहेज के पक्ष में तर्क – बहुत से मसीही दहेज दिये जाने के पक्ष में याकूब का उदाहरण देते हुये कहते हैं ‘‘कि वह अपने ससुर का घर छोड़ते समय पर्याप्त सम्पत्ति ले कर गया’’। उनके अनुसार वह दहेज था। परन्तु इस संबंध में हमें इस तथ्य को स्मरण रखना है कि याकूब ने अपने ससुर के घर में करीब 20 वर्ष काम किया था और जो सम्पत्ति याकूब लाबान के घर से ले कर निकला, वह उसके अथक परिश्रम से अर्जित सामग्री थी। याकूब का यह कथन कि ‘‘यदि यहोवा मुझे नहीं झिड़कता, तो शायद तू मुझे खाली हाथ ही वापिस लौटा देता’’ (उत्पत्ति 31:42 के अनुसार) इस तथ्य की पुष्टि करता है। परम्परा का आधार – बहुत से मसीही दहेज को इस देश की परम्परा व संस्कृति मान कर कहते हैं कि हमें इनके अनुसार चलना अनिवार्य है। परन्तु मसीह में मेरे प्रियो, पवित्र शास्त्र पूर्ण दृढ़ता से परम्पराओं, रीति रिवाजों को पवित्रशास्त्रीय नियमों के बराबर दर्जा देने का विरोध करता है क्योंकि मनुष्य-रचित कुछ परम्पराएं ‘‘दुष्ट द्वारा प्रेरित होकर हमसे परमेश्वरीय आज्ञाओं की अवहेलना करा सकती है’’। प्रभु यीशु ने फरीसियों को फटकारा था ‘‘तुम अपनी रीतों के कारण क्यों परमेश्वर की आज्ञा टालते हो’’ (मत्ती 15:3)। दहेज मसीही धर्म के विरूद्ध है – दहेज पूर्णतः मसीही धर्म के सिद्धान्तों और शिक्षाओं के विरूद्ध है, यह निम्नलिखित बिन्दुओं द्वारा स्पष्ट होता है – 1. मसीही विवाह मसीह पर आधारित - मसीही विवाह का सबसे महत्वपूर्ण सिद्धान्त है कि विवाह मसीह रूपी नींव पर आधारित होता है। अदृश्य मसीह ही विवाह में उपस्थित हो पति-पत्नि को जोड़ता है। यदि हम विवाह को दहेज पर आधारित कर रहे हैं तो हम निश्चित रूप से मसीह की उपेक्षा कर रहे हैं। कोई भी व्यक्ति दो स्वामियों की सेवा नहीं कर सकता। हमें दहेज या मसीह में से एक को चुनना है। अभी इस विषय में निर्णय लें ‘‘मैं अपने विवाह में पूर्णतः मसीह पर आधारित हूंगा/हूंगी; दहेज की कोई चर्चा भी विवाह निश्चित करते समय या विवाह पश्चात नहीं करूंगा/करूंगी’’ आमीन्। 2. पत्नि एक उत्तम आशीष – नीतिवचन 18:22 के अनुसार ‘‘जिसने पत्नि पा ली, उसने उत्तम आशीष पा ली’’। प्रियो इस आशीष के लिये हमें परमेश्वर को हर पल धन्यवाद देना है। वर के माता-पिता द्वारा परमेश्वर को उनके पुत्र के लिये अच्छी पुत्रवधु देने के लिये, उसका घर बसाने के लिये धन्यवाद देना चाहिए, न कि गिन कर कुड़कुड़ाना चाहिए। वधु पक्ष को कोस कर परमेश्वर के क्रोध को स्वयं के ऊपर बुलाना है। प्रत्येक युवती परमेश्वर, अपने सृजनहार की अनुपम कृति है, उसकी रचना है, उसका प्रतिबिम्ब है। परमेश्वर की रचना का सम्मान कीजिये, बिना उचित कारणों के उसे ठुकराना परमेश्वर की सृजनात्मकता का अपमान है। किसी ने क्या खूब कहा है, ‘‘किसी भी व्यक्ति को सबसे बड़ा उपहार उसके व्यक्तित्व का उचित सम्मान देना है’’। अतः व्यक्तित्व का मूल्यांकन दहेज से न करें। 4. दहेज मानवीय स्वार्थ और लोभ का प्रतीक है – दहेज शैतानी प्रवृत्ति है क्योंकि उसके मूल में है लोभ और स्वार्थ। बन्द आंखों को खोलिए, दुष्ट की चालों को पहचानिए। धन का लोभ सब बुराइयों की जड़ है। दहेज अनरीति से आता है, अतः ठहरता नहीं। उसके आने से घर में जलन, कलह और विभाजन आता है। घृणा और दुर्भावनाएं मनों में आसन जमातीं हैं। मसीह का उदाहरण – देने वाले बनें न कि लेने वाले – आज हमें यह प्रश्न अपने आप में पूछना है कि हम मसीह के समान देने वाले हों या लेने वाले? स्वार्थ और धन के लाभ में अपने घरों को घृणा, ईर्ष्या और शीत-युद्ध के अड्डे बनने से बचाएं! इसी में हमारे विश्वास की पहचान है। विवाह संबंधों में सन्तुलन आवश्यक – यदि हम विवाह जैसे पुनीत व आनंदमय अवसरों की सुन्दरता को बनाये रखना चाहते हैं तो आवश्यक है वर-वधू पक्ष निम्नलिखित बिन्दुओं पर चलें – 1. मंहगाई के इस युग में जब प्रत्येक घर इस की ओर से पीड़ित हैं; यह कहां की बुद्धिमत्ता है कि हम विवाह को दिखावे का या आत्मश्लाघा का आधार बनायें? जितना भी हो सके विवाह में सादगी को अपनाया जाये, उसी में पूरे मसीही समाज की भलाई है। 2. विवाह के खर्चों में सन्तुलन बनाये रखते हुये दोनों ही पक्षों को इन खर्चों को बराबर बांट लेना चाहिये, ‘‘तुम में से प्रत्येक अपनी ही नहीं वरन् दूसरे के हित की भी चिन्ता करे’’। 3. यदि एक पक्ष आर्थिक रूप से सुदृढ़ है व दूसरा दुर्बल तो सुदृढ़ पक्ष सच्ची मसीहियत का परिचय देते हुये अधिक भार उठाये ‘‘तुम आपस में एक दूसरे का भार उठाओ’’ यही मसीही शिक्षा है। 5. केक-कटाई के समय बड़ी मांगें रख कर कुछ लोग कन्या पक्ष को अपमानित करते हैं, अतः इस रस्म की समाप्ति में ही समझदारी है। वर को उपहार वधु पक्ष स्वेच्छा से कभी भी दे सकते हैं। उसका तमाशा-दिखावा करने में हमारी तुच्छता ही दिखती है। दहेज की कुप्रथा को दूर करने के लिये कलीसिया द्वारा उपाय – 1. दहेज प्रथा पर पास्टर, अगुवे समय-समय पर उचित शिक्षा दें। अंत में मसीही युवाओं से – मसीह ने कहा ‘‘तुम जगत की ज्योति हो’’। हमें लोभ स्वार्थ की तंग-अंधी-गलियों से बाहर निकलना है ताकि हम दूसरे वर्गों को सही मार्ग दिखा सकें। हमें ऐसे विवाह सम्बंध करने हैं, जो प्रेम, विश्वास और आपसी समर्पण पर आधारित हों, न कि स्वार्थ लोभ और अन्धी अभिलाषाओं पर, हमें एक अच्छा उदाहरण लोगों के सामने रखना है। प्रिय युवाओं, वयस्क होने के पश्चात पवित्र शास्त्र और परमेश्वरीय आज्ञाओं के विरूद्ध रीति-रिवाजों का पालन करने के लिये आप कतई विवश नहीं हैं। आप युवा ही हमारी कलीसिया के कर्णधार हैं। कलीसिया का भविष्य आपके निर्णयों पर निर्भर करता है, निर्णय जो पवित्रात्मा की अगुवाई और वचन के प्रकाश में लिये जाएं। आइये, हम सब मिलकर, मसीही विवाहों को दिखावे, झूठी होड़ और शैतानी लालच से बचाएं और पुनः मसीह पर आधारित करें। श्रीमती अनीता जोज़फ
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| Last Updated on Thursday, 20 March 2008 16:24 |



