| जीवन का सार |
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| Written by डॉ. अजय एल. लाल | |||
| Saturday, 17 March 2007 21:28 | |||
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मनुष्य अपने जीवन काल में लगातार कुछ न कुछ सीखता रहता है। अध्ययन से तो शिक्षा प्राप्त होती है, परन्तु स्वयं के अनुभवों से भी मनुष्य बहुत कुछ सीखता है और उसके जीवन पर इसका गहरा प्रभाव पड़ता है। शिक्षा भी जब अनुभूति बन जाती है, जब उसे महसूस किया जाता है तब निश्चय वह जीवन पर प्रभाव डालती है और शायद इसलिये कहा भी गया है कि, ‘‘ठोकर खाकर ही व्यक्ति संभलना सीखता है।’’ शायद यही कारण है कि जब कोई व्यक्ति अनुभवी होता है तो उसकी बात की क़ीमत ज्य़ादा होती है, उसकी बात का महत्व भी अधिक होता है। इतिहास में सुलेमान की ख्याति संसार में दूर-दूर तक फैली हुई थी, वह बहुत महान राजा माना जाता था क्योंकि वह बहुत विद्वान पुरूष था। उसके ज्ञान और बुद्धिमत्ता की बातें सुनकर लोग आर्श्चचकित रह जाते थे और उसकी प्रशंसा करते थे। दूर देशों से विद्वान और राजपुरूष भी उसकी प्रशंसा सुनकर उससे मिलने के लिए आते थे। सुलेमान न सिर्फ बहुत बुद्धिमान था बल्कि उसने कई महान कार्य भी किये थे। उसने उन दिनों के सबसे प्रमुख मंदिर के निर्माण का कार्य पूरा करवाया था। उसने अनेक इमारतें और स्तम्भ बनवाए थे। कहा जाता है कि, उससे अधिक धनी राजा इतिहास में कोई नहीं हुआ। उसके पास भोग विलास के भी अनेक साधन थे। अपने जीवन के अंतिम काल में राजा सुलेमान ने अपने अनुभवों के आधार पर पुस्तक लिखी, जो बाइबिल के पन्ने में ‘‘सभोपदेशक’’ की पुस्तक के रूप में आज भी सुरक्षित है। यह पुस्तक सुलेमान ने अपने जीवन के अंतिम समय में लिखी। वह इसमें अपने जीवन के अनुभवों की विवेचना करता है कि उसने क्या किया और क्या पाया। वह विचार करता है, अपने महान कार्यों के बारे में – वह याद करता है, अपने ऐशो आराम से भरे जीवन को; वह सोचता है उस धन के विषय में जो, उसने एकत्रित किया और वह एक बहुत चौंका देने वाली बात लिखता है, एक ऐसी बात जो कि, हमें हैरान कर देती है ........ और वह कहता है कि ....... ‘‘सब कुछ व्यर्थ है’’। ये धन, ये यश, ये बुद्धि, ये कार्य ....... यह सब कुछ व्यर्थ हैं ...... यह तो वायु को हाथ से पकड़ने के समान है, जिसमें हाथ में कुछ नहीं आता। यह सब ऐसा है, जिसका जीवन में कुछ महत्व नहीं है। उसके बाद वह अपनी पुस्तक के अंत में यह भी बताता है कि, मनुष्य के जीवन में महत्वपूर्ण क्या है, उसके लिए प्रमुखता क्या है और मनुष्य के जीवन का सार किस बात में निहित है? इस प्रमुख बात पर हम बाद में ग़ौर करेंगे, परन्तु पहले हमें यह समझना है कि, सुलेमान की यह पुस्तक और उसमें लिखे हुए उसके जीवन के अनुभव हमें एक महान संदेश देते हैं। 1. धन का लोभ और संग्रह व्यर्थ है – वर्तमान समय में लोग धन को प्राप्त करना ही जीवन का प्रमुख उद्देश्य समझते हैं, कुछ लोग बड़ा नाम हासिल करना चाहते हैं और कुछ लोग बहुत बड़े-बड़े महान कार्य करना ही जीवन का उद्देश्य मानते हैं। लोगों में भोग विलास के साधनों की प्राप्ति की आकांक्षा भी आज कम नहीं है। धन प्राप्ति की बात किसी सीमा तक ठीक तो है, लेकिन अगर वही जीवन का प्रमुख उद्देश्य है, उसी में हमारी प्रसन्नता है, धन को प्राप्त करना ही अगर हमारे लिए प्राथमिक है तो, शायद हम एक बहुत बड़ी भूल कर रहे हैं। सुलेमान के पास अपार धन था, भारी व्यापार था। वह सोने का आयात-निर्यात करता था, उसके कई जहाज़ चलते थे। उसके पास इतना धन था कि उसके घर की हर वस्तु सोने की थी। चांदी के बर्तन रखना वह अपनी तौहीन समझता था। हज़ारों दास-दासियां उसकी सेवा में लगे रहते थे। परन्तु अपने जीवन के अंत में वह इस सभोपदेशक की पुस्तक के पांचवें अध्याय में लिखता है; आगे वह कहता है ----- ‘‘यह भी व्यर्थ है’’। संसार का सबसे धनी व्यक्ति सुलेमान अपने अनुभव से यह कह रहा है कि यह धन भी व्यर्थ है। 2. बड़े-बड़े महान कार्य व्यर्थ हैं – दूसरी बात हम यह देखते हैं कि उसने बहुत महान कार्य किये थे। उसने उन दिनों का सबसे प्रमुख मंदिर बनवाया था। उसके 30 हज़ार मज़दूर और 550 प्रबंधक थे जो, लगातार निर्माण का कार्य करते रहते थे। इतने महान कार्य करने वाला राजा सुलेमान अपने जीवन के अंत में सभोपदेशक की पुस्तक के दूसरे अध्याय में लिखता है; 3. आनन्द और भोग के साधन व्यर्थ हैं – राजा सुलेमान के पास भोग विलास के साधनों की भी कमी न थी, उसके पास बहुत धन था, 30 हज़ार नौकर थे, सात सौ पत्नियां थीं और 300 दूसरी स्त्रियां थी। बड़े-बड़े संगीतज्ञ उसके दरबार में थे। परन्तु अपने जीवन के अंतिम मील के पत्थर पर खड़े हुए वह इस आनन्द और भोग के साधनों पर विचार करता है और अपनी पुस्तक के दूसरे अध्याय में लिखता है; ‘‘मैंने अपने मन से कहा चल मैं तुझे आनन्द के द्वारा जाचूंगा। इसलिये आनन्दित और मगन हो .... परन्तु देखो यह भी व्यर्थ है’’ (अध्याय 2, पद 1)। सुलेमान अपने जीवन के अंत में सारी बातों का निष्कर्ष लिखते हुए कहता है कि; - धन का लोभ और संग्रह व्यर्थ है। 4. मनुष्य की बुद्धिमत्ता और विद्वता भी व्यर्थ है – इसके बाद सुलेमान अपनी बुद्धिमत्ता पर ग़ौर करता है। वह एक बुद्धिमान राजा था, दूर देश के लोग उसकी विद्वता की चर्चा सुनकर उससे मिलने आते थे। शीबा की रानी भी बहुत मीलों की यात्रा करके उससे मिलने आई थी। सुलेमान को बुद्धि का यह विशेष दान ईश्वर से प्राप्त था। परन्तु वह अंत में इस पर भी विचार करता है और इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि यह भी व्यर्थ है। वह लिखता है; ‘‘क्योंकि न तो बुद्धिमान का और न मूर्ख का स्मरण सर्वदा बना रहेगा, परन्तु भविष्य में सब कुछ बिसर जाएगा। बुद्धिमान क्योंकर मूर्ख के समान मरता है। इसीलिये मैंने अपने जीवन से घृणा की, क्योंकि जो काम संसार में किया जाता है, मुझे बुरा मालूम हुआ; क्योंकि सब कुछ व्यर्थ और वायु को पकड़ना है’’ (सभोपदेशक 2:16,17)। जीवन में इसकी प्राप्ति भी प्रमुखतम नहीं है। इन सब बातों पर विचार करने के बाद अपनी पुस्तक सभोपदेशक के अंत में मनुष्य जीवन का जो सार है, और जो प्राथमिक होने के साथ-साथ मनुष्य का सम्पूर्ण कर्त्तव्य है, उसके बारे में सुलेमान कहता है और वह बात है ---- ‘‘परमेश्वर का भय मानना और उसकी आज्ञाओं का पालन करना’’। वह लिखता है ‘‘सब कुछ सुना गया; अन्त की बात यह है कि परमेश्वर का भय मान और उसकी आज्ञाओं का पालन कर; क्योंकि मनुष्य का सम्पूर्ण कर्त्तव्य यही है’’ (सभोपदेशक 12:13)। यही सब कुछ है, इसी में अर्थ है। यही प्रमुख कर्त्तव्य है और यही जीवन का आधार है। आज हम धन, पद, नाम और लोभ की दौड़ में इतने व्यस्त हो गये हैं कि हमने जीवन के लक्ष्य की दिशा छोड़ दी है। हमारे मनों में परमेश्वर को जानते और उसे पहचानने की इच्छा ही नहीं रही है, उद्धार को प्राप्त करने का प्रश्न हमारे विवेक को कचोटता नहीं है। सुलेमान ने जो कुछ कहा वह उसके सम्पूर्ण जीवन के गहरे अनुभवों का सार था। उसने अपने जीवन में परमेश्वर को पहचाना और जीवन में आत्मिकता को प्राथमिकता दी। आज इस बात की आवश्यकता है कि हम ध्यान दें, ठहर जाएं और विचार करें कि इस जीवन में हम क्या प्राप्त करने का प्रयास कर रहे हैं और हम किस दिशा में जा रहे हैं? क्योंकि सुलेमान यह स्पष्ट करता है कि; - धन का लोभ और संग्रह व्यर्थ है। एक अनुभवी राजा सुलेमान के अनुभव पर ग़ौर करें और परमेश्वर की योजना को जानने का प्रयास करें, उसके मार्ग को पहिचानें और उसके सत्य को जानें। इससे भी हम उद्धार प्राप्त कर सकेंगे। परमेश्वर आपके हृदय में उसको जानने और पहचानने की इच्छा दे। आप परमेश्वर का भय मानते हुए उसकी आज्ञाओं का पालन करते जावें। अपने जीवन में अनन्त जीवन की निश्चयता को प्राप्त कर सकें और यह समझ सकें कि यही जीवन में बहुमूल्य है, महत्वपूर्ण है और प्राथमिक है। डॉ. अजय एल. लाल
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| Last Updated on Thursday, 20 March 2008 16:25 |



