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गर्भपात PDF Print E-mail
Written by डॉ. अजय एल. लाल   
Tuesday, 21 November 2006 17:36

(भजन संहिता 139:8-16)
गर्भपात, यह शब्‍द आज मानव समाज के लिये कोई नया या अप‍रिचित शब्‍द नहीं है। सभी व्‍यक्ति इससे परिचित हैं, अलग-अलग विधाओं में इसे संदर्भित किया गया है। धर्मशास्‍त्र, चिकित्‍सा विज्ञान, नैतिक शास्‍त्र, तर्कशास्‍त्र, विधि विज्ञान, समाजशास्‍त्र इत्‍यादि अध्‍ययन की शाखाओं में गर्भपात की व्‍याख्‍या अलग-अलग ढंग से की गई है। सैद्धान्तिक रूप से इसकी व्‍याख्‍याएं जितनी मज़बूत और स्‍पष्‍ट हैं व्‍यवहारिक रूप में ये उतना ही जटिल और उलझन पूर्ण शब्‍द है, क्‍योंकि ये जुड़ा है व्‍यक्ति के जीवन, मृत्‍यु, उसके दर्द, हृदय की भावनाओं, और मानव की एक शारीरिक आवश्‍यकता काम (Sex) जैसे विषय से।

वर्तमान संदर्भ में यह विषय बहुत प्रमुख है, एक सच्‍चा मसीही इसे हल्‍के रूप में नहीं ले सकता, इसकी अवहेलना नहीं कर सकता। इसके प्रति समझौते का रूख अपनाते हुए परमेश्‍वर के न्‍याय से बच नहीं सकता। हमारा देश जो कि एक पुरूष प्रधान देश है, जहां परिवार में पुत्र को प्रमुखता दी जाती है। वहां गर्भपात को कानूनी रूप से मान्‍यता दी गई है और तो और अब तो भ्रूण परीक्षण के द्वारा काफी पहले ही पता लगा लिया जाता है कि गर्भ में पलने वाला बच्‍चा लड़की है अथवा लड़का। मगर इसके बावजूद न सिर्फ़ भारत में अपितु सारे संसार में, यहां तक कि आधुनिकता की दौड़ में सबसे आगे कहे जाने वाले देशों में भी यह विषय चर्चा का केन्‍द्र बना हुआ है।

अपने लेख में मैं आपके सामने चन्‍द महत्‍वपूर्ण तथ्‍य रखना चाहूंगा जिससे आप समझ सकें कि आज गर्भपात कितनी आसानी से, अधिकता से हो रहे हैं। एक सर्वेक्षण के अनुसार भारत में 40% बच्‍चों की हत्‍या गर्भपात के नाम पर की जाती है। इंग्‍लैण्‍ड में 25% बच्‍चे गर्भपात के द्वारा समाप्‍त कर दिये जाते हैं, चीन में जन्‍म लेने वाली 60% लड़कियों को पैदा होते ही या पैदा होने के साथ मार डाला जाता है। अमेरिका में प्रतिदिन 4,500 गर्भपात होते हैं।

गर्भ, जो बालक के लिए सबसे सुरक्षित स्‍थान है। परमेश्‍वर की योजना के अनुसार सबसे सुरक्षित, सुविधापूर्ण स्‍थान है; आज संसार में सबसे अधिक असुरक्षित बन गया है। जहां सबसे ज्‍यादा हत्‍याएं होती हैं।

आज एक निर्दोष बच्‍चे की हत्‍या करना सबसे अधिक आसान हो गया है। एक डाकू, बलात्‍कारी और हत्‍यारे को भी मृत्‍युदण्‍ड प्राप्‍त होने के पूर्व अपना पक्ष न्‍यायाधीश के सामने रखने का अधिकार दिया जाता है, अपने जीवन को बचाने की याचना के मौके दिये जाते हैं परन्‍तु एक मासूम बालक की स्थिति आज उससे भी बदतर हो गई है।

औसतन हर 20 सेकण्‍ड में पूरे संसार में एक गर्भपात हो जाता है। एक घण्‍टे में 180 बच्‍चों की हत्‍या कर दी जाती है। डेढ़ घण्‍टे की संक्षिप्‍त चर्च आराधना के दौरान 270 बच्‍चों की हत्‍या हो चुकती है। जितनी देर में आप यह लेख पढ़ेंगे, उतने समय में अनुमानतः 24 बच्‍चे गर्भ में ही समाप्‍त कर दिये जा चुके होंगे।

इस विषय को और अधिक स्‍पष्‍टता से समझने के लिये हमें ये भी देखना पड़ेगा कि आज सारे संसार में गर्भपात के संदर्भ में लोगों की क्‍या प्रतिक्रियाएं, मत हैं।


1. गर्भपात के पक्ष का मत (Pro Abortion view) :-

अ. इस मत के मानने वालों के अनुसार गर्भ के भ्रूण से अधिक व्‍यक्ति की स्‍वयं की परिस्थिति अधिक प्रमुख होती है।
ब. माता को अधिकार होना चाहिये कि वह जो निर्णय करे उसे उचित माना जाये, चाहे वह गर्भपात की स्‍वीकृति क्‍यों न हो परिस्थितियों के अनुसार, माता की इच्‍छा के अनुसार, गर्भपात को उचित माना जा सकता है। इस मत को मानने वाले तर्क ये देते हैं कि गर्भपात उचित है क्‍योंकि –
घर में वैसे ही बहुत बच्‍चे हैं।
अनचाहे बच्‍चे के जन्‍म से समस्‍याएं बढ़ेंगी।
परिवार की आय कम है।
कार्य नया-नया शुरू किया है, बच्‍चे के जन्‍म होने पर उसे छोड़ना पड़ेगा।
माता की शिक्षा जारी है, वह कैसे दोनों ज़ि‍म्‍मेदारियों को वहन कर सकेगी।
पति मारपीट करने वाला है, शराब पीकर बच्‍चों को मारता है। नये जन्‍मे बच्‍चे को भी उसी यंत्रणा से गुज़रना पड़ेगा।

यदि इन तर्कों को देखें तो लगता है कि माता का निर्णय, परिस्थितियां प्रमुख हैं गर्भपात उचित है। परन्‍तु, इस मत को मानने वाले वे लोग हैं जो मसीही नहीं। जो न ईश्‍वर पर विश्‍वास करते हैं और न ही उनके सामने जीवन की कोई कीमत है। उनके लिये सुविधा की प्रमुखता है, व्‍यवहारिकता ही सब कुछ है उनके लिये। उन्‍हें न ईश्‍वर, न उसके न्‍याय का भय है और न प्रभु यीशु मसीह पर विश्‍वास। बहुत दुखद परिस्थिति है यह। परन्‍तु, इससे भी अधिक दुखद और त्रासदीपूर्ण बात ये है कि कुछ लोग अपने आप को मसीही तो कहते हैं परन्‍तु वे गर्भपात को भी मान्‍यता देते हैं।

2. गर्भपात के प्रति असहमति का पक्ष (Anti Abortion View) :-

गर्भपात का विरोध करने वाले वे लोग हैं जो यह विश्‍वास करते हैं कि ईश्‍वर ने मनुष्‍य को अपनी समानता में बनाया है। ईश्‍वर के वचनों पर चलने वाले, प्रभु यीशु मसीह के पीछे चलने वाले ये वे लोग हैं जो परिस्थितियों से बढ़कर ईश्‍वर के वचन को मानते हैं और जो परिस्थितियों के दबाव में समझौता नहीं करते। वे यह मानते हैं कि जैसे ही शुक्राणु गर्भ में प्रविष्‍ट होता है उसमें जीवन आ जाता है, ईश्‍वर की श्‍वास आ जाती है।

अमेरिका के भूतपूर्व राष्‍ट्रपति श्री रोनाल्‍ड रीगन से गर्भपात के संबंध में उनका मत जानने के लिए प्रश्‍न किया गया, उत्‍तर में उन्‍होंने प्रश्‍न किया यदि आपको अचानक आपकी राह में सामने एक व्‍यक्ति पड़ा हुआ मिले और ये निर्णय कठिन हो कि उसमें जीवन है या नहीं, आप क्‍या करेंगे? क्‍या आप मरा समझ कर उसे कब्रिस्‍तान ले जाकर दफ़ना देंगे या फिर अस्‍पताल ले जाकर डॉक्‍टर से परामर्श लेंगे।

गर्भपात के संबंध में हम पवित्र वचन से संबंधित कुछ तथ्‍यों को जानेंगे। भजन संहिता का 139 वां अध्‍याय तथा अय्यूब 10:8-12 इस संदर्भ में पठनीय हैं।

अ. रचना – ‘‘मेरे मन का स्‍वामी तो तू है; तू ने मुझे माता के गर्भ में रचा। मैं तेरा धन्‍यवाद करूंगा, इसलिये कि मैं भयानक और अद्भुत रीति से रचा गया हूं। तेरे काम तो आश्‍चर्य के हैं, और मैं इसे भली-भांति जानता हूं।’’ (भजन संहिता 139:13-14)
इन पदों में ‘रचना’ शब्‍द प्रयोग हुआ है जिसका हीब्रू – ग्रीक भाषा में अर्थ होता है बनाया जाना (जैसे कुम्‍हार या कलाकार कुछ बनाता है) और बुना जाना (जैसे बुनकर दरी अथवा अन्‍य कोई चीज़ बुनता है) 14 वें पद में दाऊद लिखता है उसे परमेश्‍वर ने अद्भुत, भयानक, आश्‍चर्यपूर्ण रीति से रचा।
ब. सतत प्रक्रिया – दाऊद एक युवा पुरूष था, वो अतीत (भूतकाल की ओर) देखकर कहता है ‘‘तूने मुझे माता के गर्भ में रचा’’ (13 वां पद) दाऊद कहता है तूने मुझे रचा, और यह प्रक्रिया निरन्‍तर बनी हुई है चूंकि इसी अध्‍याय के तीन और चार पद में वो कहता है कि तू मेरे चाल-चलन को जानता है (यह वाक्‍य उसके वर्तमान को इंगित करता है)। इस प्रकार दाऊद अपनी रचना (प्रत्‍येक मनुष्‍य के रचे जाने को) को तीनों अवस्‍थाओं में एक निरन्‍तरता के साथ पाता है। उसमें निरन्‍तरता बनी हुई है और यह निरन्‍तरता अपनी माता के गर्भ में उसके आने के साथ ही प्रारम्‍भ हो गई थी।

स. संबंध – परमेश्‍वर का व्‍यक्ति से जो संबंध है वो नितांत व्‍यक्तिगत है जिसका उल्‍लेख दाऊद भजन संहिता 139वें अध्‍याय के लगभग हर पद में करता है। इस संबंध के प्रकटीकरण के रूप में वो अपने भजन में मैं, मेरा, मेरी शब्‍दों का 46 बार एवं तू, तेरा, तेरी शब्‍दों का 32 बार प्रयोग करता है। मानव से परमेश्‍वर का यह व्‍यक्तिगत संबंध गर्भ में उसके भ्रूण रूप में विकसित होने के साथ ही प्रारम्‍भ हो जाता है। चूंकि भ्रूण एक बढ़ता हुआ मानव जीवन है। हम यह नहीं कह सकते है कि भ्रूण मानव जीवन नहीं है चूंकि यह बोल नहीं सकता, देख नहीं सकता, चल नहीं सकता, भावनाएं व्‍यक्‍त नहीं कर सकता अतः यह मानव नहीं है। यदि हम ऐसा मानकर चलें तो फिर हमें यह मानना पड़ेगा कि कोई भी छोटा बच्‍चा, अंधा, गूंगा, विकलांग, विक्षिप्‍त व्‍यक्ति भी मानव नहीं है।

भ्रूण है तो वह पूर्ण मानव जीवन है। परमेश्‍वर द्वारा रचित है, परमेश्‍वर की समानता में है। भ्रूण के विकसित होने की प्रक्रिया गर्भ से बाहर आने के बाद पूर्ण जीवन में मृत्‍यु तक मानव रूप में चलती रहती है। इस तथ्‍य की बाइबिल के द्वारा भी पुष्टि होती है। नये नियम में लूका रचित सुसमाचार के प्रथम अध्‍याय के 39 से 44 वें पदों में यह पुष्‍टीकरण हमें प्राप्‍त होता है जहां इस प्रकार वर्णन है कि बच्‍चा ‘पेट में उछल पड़ा’ अर्थात् उसमें मानवीय संवेदनाएं विद्यमान हैं।

यीशु मसीह का जीवन इस तथ्‍य की पुष्टि करता है, पवित्र आत्‍मा के द्वारा वह मरियम के गर्भ में आया, बालक से युवा हुआ, बढ़ता गया पर वह सदैव एक सा था।
आधुनिक चिकित्‍सा विज्ञान भी इस तथ्‍य की पुष्टि करता है कि भ्रूण में भी मानवीय संवेदनाएं होती हैं। 1960 में डिम्‍ब (Ovum) निषेचन (Fertilized) होता है जो कि माता-पिता से फ़र्क, एक नयापन लिये होता है। 24 जोड़ों में गुणसूत्र (Chromosomes) पूर्ण हो जाते हैं, लिंग निर्धारित हो जाता है। स्‍वभाव तक नियत हो जाता है। स्‍वीडिश फोटोग्राफर लेनर्ड नेल्‍सन ने इस तथ्‍य की पुष्टि में अपनी पुस्‍तक में भ्रूण की विभिन्‍न अवस्‍थाओं के चित्र लिये हैं। जो कि यह बताते हैं कि भ्रूण भी एक मानव जीवन है क्‍योंकि –
3 सप्‍ताह में बच्‍चें का दिल धड़कने लगता है।
4 सप्‍ताह में 1/4 इंच आकार होते हुए भी सिर/धड़ दिखाई देने लगता है।
6 सप्‍ताह में मस्तिष्‍क का कार्य करना शुरू हो जाता है।
8 हफ्ते में उंगलियां और हथेली तक बन जाती है।
10 से 12 हफ्ते में बच्‍चा हाथ हिला सकता है, अंगूठा मुंह तक लाकर चूस सकता है।
13 हफ्ते में शरीर का हर भाग पूर्णतः स्‍पष्‍ट हो जाता है। यहां तक कि हाथ की लकींरें और फिंगर प्रिंटस (उंगलियों के निशान) तक उभर आते हैं।
3 माह में हिलना डुलना, घबराना, अंधेरे/उजाले का अहसास करना, खुशी का अहसास होना शुरू कर देता है।
4 माह में आंख स्‍पष्‍ट, भौंह, बाल उग जाते हैं, रोने की क्षमता आ जाती है। संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ ने 1959 में यह प्रस्‍ताव पारित किया कि संसार के हर भाग में बच्‍चे की पैदा होने के पहले और बाद में पूरी तरह देखरेख और सुरक्षा की जावेगी।

बच्‍चा जो गर्भ में विकसित हो रहा है जो अबोध है उसकी रक्षा होनी चाहिये। जो बोल नहीं सकता, चिल्‍ला नहीं सकता, जीवन की भीख नहीं मांग सकता, हत्‍या करने को आगे बढ़ते औज़ार और हाथों को रोक नहीं सकता। उसके जीवन की रक्षा की जाना उसका अधिकार होता है, उसका अधिकार होना चाहिये। अतः गर्भपात जानबूझकर किया गया योजनाबद्ध हत्‍या का कार्य है।

परन्‍तु किन्‍हीं परिस्थितियों में गर्भपात को उचित माना जा सकता है और ये परिस्थिति केवल एक है, यदि माता के जीवन को ख़तरा है। “Only if the possibility of Death is there.” – Dr. Ramsay
परन्‍तु माता के जीवन के ख़तरे की संभावना, मां बनने वाली 6000 स्‍त्रि‍यों में से अनुमानतः मात्र 1 को ही होती है, यदि वह उचित आयु में गर्भ धारण करती है।

अतः गर्भ में बालक की हत्‍या मानव की हत्‍या के बराबर है। यदि हम कहें कि हमारे सामने आने वाली कठिनाई के कारण हमारा बच्‍चे की हत्‍या गर्भ में ही करना कानूनन जायज़ है, उचित है तो फिर हर एक समस्‍या पैदा करने वाले व्‍यक्ति की हत्‍या करना भी जायज़ है, वैधानिक है। यदि इस तर्क को संसार में वैधानिक मान्‍यता दे दी जाये जिस आधार पर गर्भपात को वैधानिक मान्‍यता प्रदान की गई है तो फिर इस आधार का सहारा लेकर हत्‍या करना गैर कानूनी नहीं रह जायेगा। आप स्‍वयं सोच सकते हैं कि तब संसार का क्‍या हाल होगा? अतः यह दोहरा मापदण्‍ड क्‍यों?

अब प्रश्‍न यह उठता है कि हमें क्‍या करना है? 1. हमें पश्‍चाताप करना है –

अपनी उस प्रतिक्रिया के प्रति जिसके द्वारा हमने गर्भपात को बहुत आसानी से स्‍वीकार कर लिया है।

यदि हमने अपने परिवार में ऐसा किया है या ऐसा होने दिया है।

2. सरकार से बाइबिल के आधार पर निवेदन करना चाहिये कि भारत में गर्भपात को ग़ैर कानूनी करार दिया जाये।

हमें विरोध प्रगट करना चाहिये। गर्भपात को कानूनी मान्‍यता प्रदान करने वाली इस व्‍यवस्‍था का जो कि परमेश्‍वर की व्‍यवस्‍था का खुला विरोध कर रही है। हम सोचें कि हम जो उसके लोग हैं, उसकी प्रजा हैं क्‍या कर रहे हैं?
लोगों को गर्भपात न करवाने के लिये तैयार करना है।

जो लोग ऐसा करने की सोचते हैं उन्‍हें शिक्षित करना है, बताना है, रोकना है। वचन के दायरे में रहकर गर्भपात की गंभीरता को समझाना है।

3. यीशु मसीह की वास्‍तविकता को हमें खुद को जानना है, दूसरों को बताना है। मनुष्‍यों को यह बताना है कि परमेश्‍वर की दृष्टि में मानव का क्‍या मूल्‍य है, कि उसने हमें बचाने के लिये अपने पुत्र को इस संसार में भेजा, बलिदान कर दिया। और हम तो मानव तभी निर्धारित हो जाते हैं जब हम अपनी माता के गर्भ में आ जाते हैं।

परमेश्‍वर ने मुझे, आपको माता के गर्भ में रचा, अपने आत्‍मा का श्‍वास हमारे जीवन में फूंका। हमें गर्भ से ही बढ़ाया, इस संसार में लाया और इतना प्रेम किया कि हमारे लिये अपने पुत्र को बलिदान कर दिया। तो हम क्‍यों और किस अधिकार से परमेश्‍वर की इस महानतम, अपूर्व रचना को गर्भ में ही समाप्‍त करते चले जा रहे हैं?

डॉ. अजय एल. लाल

Last Updated on Thursday, 20 March 2008 18:43
 
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