| जवान की विशेषताएं |
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| Written by श्री यिर्मयाह मुर्मू | |||
| Friday, 22 September 2006 16:48 | |||
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सांसारिक, सामाजिक, राष्ट्रीय तथा धार्मिक कार्यों की उन्नति जवानों पर निर्भर है। यदि जवान सुस्त और दर्शनहीन हैं तो उन्नति संभव नहीं। यदि जवान सरगर्म और दर्शन देखने हारे हों तो हर क्षेत्र में उन्नति और विकास निश्चित है। जवान ही तो कार्य करने वाले हैं। यदि कार्य ही न किये जायें तो सफलता कहां से हो सकती है? यदि प्रचार ही न हो, तो सुनना और समझना कहां से हो? यदि लोग न सुनें और न समझें तो उद्धार और बचाव कहां से हो? खेत तो कटनी के लिए तैयार हैं पर काटने वाले मज़दूर ही न हों तो फ़सल कहां से काटी जा सकती है? जिस प्रकार जवान घर और समाज की शोभा और आशा होता है उसी प्रकार वह धर्म की शोभा भी होता है। उसी पर प्रचार का भार और भविष्य की नेंव है। जब जवान सरगर्म और उत्साही होते हैं तब जीवन की भरपूरी होती है। जब जवान धार्मिक भावनाओं से भरे हुए, विश्वासी और आत्म-समर्पित होते हैं तब धर्म की हर रीति से उन्नति होती है। जवान का इतना महत्व क्यों? जवानी जीवन की बसन्त ऋतु है – जिसमें रूप, रंग, सुन्दरता, शक्ति, उमंग, उत्साह, बुद्धि आदि सभी शारीरिक एवं मानसिक शक्तियां अपनी उत्तम स्थिति में पाई जाती हैं। जीवन कली मानो जवानों में खिलती है और एकाएक अपने उद्गार को प्रगट कर देती है। भिन्न-भिन्न शक्तियां भिन्न-भिन्न खिले हुए फूलों की नाई जवानी की क्यारी को सुशोभित करती हैं। इन रंगीन, सुगन्धित फूलों में महान आकर्षण और विषम मनोहरता है। जवान इन सारी शक्तियों से युक्त अनेक स्वप्न देखता है और विभिन्न अभिलाषाएं करता है। साधारण जवान मान, बड़ाई, गौरव, धन-सम्पत्ति, घमण्ड आदि की अभिलाषाओं के लोभ में फंस जाता है। वह मान, धन, पद का बड़प्पन, ज्ञान आदि सांसारिक चीज़ों की खोज में सारी शक्तियां लगा देता है। (1यूहन्ना 2:16) में ‘‘वह शरीर की अभिलाषा, आंखों की अभिलाषा और जीविका के घमण्ड में लीन हो जाता है। जो मुख्यतः सांसारिक तथ्य है।’’ ईश्वर से बिल्कुल दूर हो जाता है। वह संसार के वश में होकर स्वेच्छाचार करने लगता है – बड़ों की सलाह एवं शिक्षा को हंसी मज़ाक में उड़ा देता है। ऐसी जवानी असफल हो जाती है। पानी की धारा अपनी सीमा में न बहने से वर्णनीय हानि पहुंचाता है। उसी प्रकार जवानी के स्वच्छन्द और उच्छश्रृंखल हो जाने से कोई लाभ नहीं होता, बल्कि हानि ही होती है। वही जवान सफलता प्राप्त कर सकता है जो अपनी शक्तियों को संयम के साथ, उचित मार्ग पर लगाता है। बाइबिल बताती है (सभोपदेशक 12:1) कि, इसलिये, हे जवान, अपनी जवानी के अभिलाषाओं से भाग; अपने सिरजनहार को अपनी जवानी के दिनों में स्मरण कर, अपने ज्ञान, बुद्धि, समय शक्ति, जोश, उमंग, उत्साह आदि सभी को प्रभु के हाथ में समर्पित कर और उसी की याद करते हुए अपने जीवन के कार्य कर। हे जवान, तू चाहे जीवन में जो भी काम कर परन्तु प्रभु की महिमा और नाम के लिये कर। तब जीवन की सभी इच्छित वस्तु अधिकता और भरपूरी से प्राप्त हो सकेगी। जिनको साधारण जवान सारी शक्ति लगाकर तन, मन और धन से खोजते और पाते नहीं, वही तुम्हें आसानी से मिल जायेंगे। सुलेमान राजा को स्मरण कीजिये। जब वह राजा हुआ, उसने परमेश्वर यहोवा से धन, महिमा, ऐश्वर्य, शत्रुओं का नाश आदि कुछ नहीं मांगा। बल्कि उसने यहोवा से उचित न्याय, बुद्धि का ज्ञान मांगा। जिससे उसे ज्ञान, धन, मान आदि सब कुछ मिला। ऐसा कि उसके समान ज्ञानी, धनी, महिमाशाली और कोई नहीं हुआ। ऐसे अनेकों जवानों का वर्णन किया जा सकता है जिन्होंने अपने समर्पित जीवन के द्वारा ऐसी-ऐसी चीजें सरलतापूर्वक प्राप्त की जो अन्य जवानों को जी लगाकर खोजने पर भी प्राप्त नहीं होती हैं और न ही मिलती हैं। इसलिए हे जवान, अपना तन, मन, धन और प्राण प्रभु परमेश्वर को अर्पित कर दे और संसार की चीज़ों के बदले ‘‘पहले ईश्वर के राज्य और धर्म की खोज करो तो ये सब वस्तुएं भी तुम्हें दी जायेंगी।’’ (मत्ती 6:33) श्री यिर्मयाह मुर्मू, बिहार
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| Last Updated on Thursday, 20 March 2008 18:26 |



