दैनिक मनन

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    स्‍वतन्‍त्र होना ‘‘जीवन की आत्‍मा की व्‍यवस्‍था ने मसीह यीशु में मुझे पाप की, और मृत्‍यु की व्‍यवस्‍था से स्‍वतंत्र कर दिया’’। (रोमियों 8:2)मसीह ने स्‍वतन्‍त्रता के लिए हमें स्‍वतन्‍त्र किया...

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बुद्धि‍मान और मूर्ख मनुष्‍य का दृष्‍टान्‍त PDF Print E-mail
Written by डॉ. श्रीमती इन्‍दु लाल   
Thursday, 21 September 2006 20:38

 

सन्‍दर्भः- मत्‍ती 7:24-27 लूका 6:47-49 ‘‘इसलिए जो कोई मेरी ये बातें सुनकर उन्‍हें मानता है वह उस बु‍द्धि‍मान मनुष्‍य की नाई ठहरेगा जिसने अपना घर चट्टान पर बनाया। और मेह बरसा और बाढ़ें आई, और आन्धियां चलीं, और उस घर पर टक्‍करें लगीं, परन्‍तु वह नहीं गिरा, क्‍योंकि उसकी नेव चट्टान पर डाली गई थी। परन्‍तु जो कोई मेरी ये बातें सुनता है और उन पर नहीं चलता वह उस निर्बुद्धि‍ मनुष्‍य की नाई ठहरेगा जिस ने अपना घर बालू पर बनाया। और मेह बरसा, और बाढ़ें आई, और आन्धियां चलीं, और उस घर पर टक्‍करें लगीं और वह गिरकर सत्‍यानाश हो गया।’’

पृष्‍ठभूमि एवं प्रस्‍तावनाः- पर्वतीय उपदेश देते समय प्रभु यीशु मसीह के चारों ओर बड़ी भीड़ एकत्रि‍त थी। लोग उसके वचन से प्रभावित थे। प्रभु यीशु मसीह ने इस दृष्‍टान्‍त को बताने के ठीक पहले भी लोगों से कहा था कि, ‘‘प्रत्‍येक जो मुझसे हे प्रभु – हे प्रभु कहता है, स्‍वर्ग के राज्‍य में प्रवेश न करेगा, परन्‍तु जो मेरे स्‍वर्गीय पिता की इच्‍छा पर चलता है, वही प्रवेश करेगा।’’ यह कहने के बाद उसने बुद्धि‍मान और मूर्ख मनुष्‍य का दृष्‍टान्‍त बताया। इस दृष्‍टान्‍त से वह लोगों को बताना चाहता था कि वचन सुन लेना मात्र पर्याप्‍त नहीं। सतही धार्मिकता से कोई लाभ नहीं। केवल होठों से स्‍तुति परमेश्‍वर को स्‍वीकार्य नहीं। परमेश्‍वर हम से आज्ञाकारिता की अपेक्षा करता है। वो चाहता है कि हम उसे अपने हृदय में स्‍थान दें और उसके वचन के अनुसार जीवन जिएं।

विषय वस्‍तुः- प्रभु यीशु मसीह ने अपने वचन के सुनने वालों से कहा कि जो कोई मेरे वचन को सुनकर उस पर चलता है वह उस बु‍द्धि‍मान मनुष्‍य के समान है जिसने अपना घर चट्टान पर गहरी नींव खोदकर बनाया और पानी बरसा, बाढ़ें आई, आंधियां चलीं और उस घर से टकराई फिर भी वह नहीं गिरा क्‍योंकि वह बहुत मज़बूत था। परन्‍तु जो वचन पर सुनकर उस पर नहीं चलता वह उस मूर्ख मनुष्‍य के समान है जिसने बालू पर बिना नींव का अपना घर बनाया और जब आंधी चली तब यह घर धराशायी हो गया और पूर्ण रूप से नष्‍ट हो गया।

व्‍याख्‍याः- इस दृष्‍टान्‍त में – घर – मनुष्‍य का जीवन, चट्टान – प्रभु यीशु मसीह पर विश्‍वास और उसकी शिक्षाएं, बालू – सांसारिक शिक्षाएं, बुद्धि‍मान मनुष्‍य – जो प्रभु यीशु मसीह पर विश्‍वास करते और उसकी शिक्षाओं के अनुसार जीवन जीते हैं, मूर्ख मनुष्‍य – जो प्रभु यीशु मसीह की शिक्षाओं को नहीं मानते।

हम सब यह जानते हैं कि घर बनाते समय नींव का मज़बूत होना आवश्‍यक होता है। साथ ही पथरीली ज़मीन भी घर की मज़बूती के लिए आवश्‍यक होती है। रेतीली और भसभसी ज़मीन पर बने घर में जल्‍द ही दरारें पड़ने लगती हैं और ऐसे घर मज़बूत नहीं होते। हमें यह भी मालूम है कि चट्टान को काटने के लिए और उस पर नींव खोदने के लिए बहुत अधिक परिश्रम करना पड़ता है परन्‍तु बालू पर नींव खोदना बहुत आसान होता है।

ठीक उसी प्रकार जो परमेश्‍वर पर विश्‍वास करते हैं, जिनके जीवन का आधार प्रभु यीशु मसीह की शिक्षाएं हैं, उनके जीवनों में नैतिक गुणों का और अच्‍छी आदतों का विकास होता है। इन गुणों को आदत बनाना जीवन की शैली बनाना चट्टान को खोदने के समान ही कठिन होता है। किन्‍तु फिर जीवन में आंधी, तूफान और बाढ़ के समान कितने भी प्रलोभन आएं, शैतान कितनी ही बड़ी परीक्षाएं हमारे सामने उपस्थित करे और चाहे हम विषम परिस्थितियों से होकर गुज़रें तब भी हमारा जीवन चट्टान पर बने हुए घर के समान स्थिर रहेगा। हर बुराइयों से हम दूर रहेंगे और हमारे जीवन में सच्‍ची खुशी, पूरी सन्‍तुष्टि और शान्ति बनी रहेगी। इसी से हम बुद्धि‍मान मनुष्‍य ठहरेंगे।

यदि हम परमेश्‍वर की शिक्षाओं की अवहेलना करते हैं तो हमारे जीवनों में खराब आदतों का विकास उतनी ही आसानी से होता है जैसे बालू पर घर बनाना आसान होता है। यह घर बाहर से भले ही आकर्षक और खूबसूरत प्रतीत हो किन्‍तु इसमें कोई मज़बूती रहती नहीं। ऐसे जीवनों में जब परीक्षाएं आती हैं, प्रलोभन आते हैं तो ये शैतान के जाल में बहुत ही आसानी से फंस जाते हैं। ऐसे जीवन खराब आदतों और ग़लत संगति से घिरते जाते हैं और अंततः दुःख, तकलीफ, निराशा, ख़ालीपन और असंतुष्टि से भर जाते हैं। इस तरह अपने जीवन को बर्बाद करने वाले ऐसे मनुष्‍य मूर्ख ठहरते हैं।

इस दृष्‍टान्‍त में उल्‍लेखनीय है कि परीक्षाएं तो सभी मनुष्‍यों के जीवनों में आएंगी परन्‍तु इन परीक्षाओं में मनुष्‍य की प्रतिक्रियाएं निर्धारित करेंगी कि वे खरे निकलकर बुद्धि‍मान ठहरेंगे अथवा इनसे हारकर मूर्ख ठहरेंगे। प्रभु यीशु मसीह की भी परीक्षा हुई किन्‍तु वचन की सामर्थ्‍य से वह परीक्षा में विजयी हुआ। विषम परिस्थितियों में मसीहियों की प्रतिक्रिया अन्‍य लोगों से भिन्‍न प्रगट होनी चाहिये। इस भिन्‍नता में प्रभु यीशु की शोभा प्रगट होनी चाहिये तभी हम परमेश्‍वर की दृष्टि में बुद्धि‍मान मनुष्‍य ठहरेंगे।

निरन्‍तर प्रार्थना, वचन का अध्‍ययन विश्‍वासियों की संगति तथा उसकी देह की सहभागिता द्वारा हमें अपने जीवनों को दृढ़ और मज़बूत करना है। उसकी देह की सहभागिता हमें अपनी क़ीमत का अहसास कराती है कि हम उसके पवित्र लोहू से मोल लिए हुए लोग हैं। हमें संसार की व्‍यर्थ एवं सस्‍ती बातों में नहीं उलझना है। हमें इनसे ऊपर उठना है। अपना ध्‍यान इस संसार के उस पार अनन्‍त जीवन की ओर केन्द्रित करना है। तभी हमारी प्रतिक्रियाएं भिन्‍न होंगी और हम दृढ़ता से उसकी सामर्थ्‍य द्वारा उसके मार्ग पर आगे बढ़ेंगे।

इनमें से एक भी बात में चूकने से परीक्षाओं में पड़ना और अपने जीवन को व्‍यर्थ गंवाना बड़ा आसान होता है, क्‍योंकि शैतान निरन्‍तर जवान सिंह और भूखे भेड़ि‍ये की तरह इस मौके की तलाश में रहता है कि कब हमारा अहेर करे और कब हमें परमेश्‍वर से दूर कर दे।

व्‍यवहारिक पक्ष एवं आत्मिक शिक्षाः-

1. हमें अपने जीवन का आधार प्रभु यीशु मसीह एवं उसकी शिक्षाओं को बनाना है।

2. हमें आत्‍मानुशासित होकर परमेश्‍वर की आज्ञाओं का पालन करना है। इन्‍हें अपने जीवन का अंग बनाना है। परमेश्‍वर ने आज्ञाएं मनुष्‍य की आत्मिक सुरक्षा और शांति के लिए ही बनायी हैं। इन आज्ञाओं के दायरे में रहने में ही मनुष्‍य की भलाई है। इनके द्वारा मनुष्‍य न केवल स्‍वयं को विभिन्‍न बुराइयों से बचाकर सच्‍चे आनन्‍द और शांति का अनुभव करता है बल्कि अनन्‍त जीवन की निश्‍चयता भी प्राप्‍त करता है।

डॉ. श्रीमती इन्‍दु लाल

Last Updated on Thursday, 20 March 2008 18:36
 
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