| दो पुत्रों का दृष्टान्त |
|
|
|
| Written by डॉ. श्रीमती इन्दु लाल | |||
| Thursday, 21 September 2006 20:19 | |||
|
प्रस्तावना एवं पृष्ठभूमिः- इस दृष्टान्त का उल्लेख केवल मत्ती ने किया है। मरकुस, लूका एवं यूहन्ना में यह दृष्टान्त नहीं मिलता है। यह दृष्टान्त प्रभु यीशु मसीह ने खजूर के रविवार के बाद बैतनिय्याह से लौटकर दूसरे दिन यरूशलेम के मन्दिर में उपस्थित शास्त्रियों एवं पुरनियों के एक कपटपूर्ण प्रश्न के उत्तर में सुनाया। प्रभु यीशु मसीह में दिव्य शक्ति थी। जिसके द्वारा वह बीमारों को चंगाई, अंधों को आंखें, बहरों को कान, भूखों को रोटी और कोढ़ियों को शुद्धता का दान देता था। यहां तक कि मरे हुओं को भी वह जिला उठाता था। वह बहुतेरे पापियों को पापों से क्षमादान बड़े ही अधिकारपूर्ण ढंग से दिया करता था। (मत्ती 9:2-6 के अनुसार) उसके उपदेश शास्त्रियों एवं फरीसियों के स्वार्थपूर्ण एवं आडम्बरयुक्त उपदेशों से मेल नहीं खाते थे। उसका अन्य धार्मिक अगुवों की भांति विधिवत अभिषेक नहीं हुआ था। वह उनकी महासभा से किसी प्रकार की सलाह या अनुमति भी नहीं लिया करता था, क्योंकि उसे स्वयं सर्वोच्च अधिकारी परमेश्वर पिता के द्वारा अधिकार प्राप्त हुए थे जिसने उसे इस जगत में भेजा था। (यूहन्ना 1:12; 5:21,26-27; 6:38; 7:16; 8:18,54 के अनुसार) न केवल उसके उपदेश धार्मिक अगुवों के उपदेशों से भिन्न थे परन्तु उसकी जीवन शैली, कार्य एवं व्यवहार भी उनकी तथाकथित धार्मिक परम्पराओं एवं दिखावटी रीतिरिवाजों से पूर्णतः भिन्न थे। (मत्ती 15:8-20,23:27-28, मरकुस 12:38-40, यशायाह 1:12-17 के अनुसार) प्रभु यीशु मसीह हृदय की भक्ति को अधिक महत्व देता था, मात्र दिखावटी भक्ति की वह भर्त्सना किया करता था। इन सब बातों से और लोगों में उसकी लोकप्रियता देखकर धार्मिक अगुवों को अपनी कुर्सी छिनने का भय था। जिसके कारण वे उसे दुष्टात्माग्रसित होने का (मत्ती 12:24 के अनुसार), पागलपन का (यूहन्ना 10:20 के अनुसार), परमेश्वर की निन्दा करने का (मरकुस 2:7 के अनुसार), तथा महसूल लेने वाले एवं पापियों के मित्र होने का (मरकुस 2:16 के अनुसार), दोष लगाते थे और लोगों को उसके विरूद्ध भड़काने का प्रयास करते थे। वे चाहते थे कि किसी प्रकार उस पर दोष लगाकर वे उसकी हत्या करवा दें। जिससे उनके पद एवं प्रतिष्ठा बरकरार रहें। (यूहन्ना 5:18; 10:31; 7:25,30; मरकुस 11:18; लूका 19:45-48) इतना ही नहीं प्रभु यीशु मसीह ने खजूर के रविवार के दिन मन्दिर में जाकर लेन देन करने वालों को मन्दिर के बाहर निकाला, सर्राफों के पीढ़े और कबूतरों के बेचने वालों की चौकियां उलट दीं और उनसे कहा लिखा है कि मेरा घर प्रार्थना का घर कहलाएगा, परन्तु तुम उसे डाकुओं की खोह बनाते हो और सब्त के दिन उसने मन्दिर में ही बहुतेरों को चंगाई दी। इसके पहले भी उसने एक बार और इसी प्रकार मन्दिर की सफाई की थी, जब फसह का पर्व निकट था और यीशु यरूशलेम गया और मन्दिर में उसने बैल, भेड़ और कबूतर बेचने वालों और सर्राफों को बैठे हुए पाया तब उसने रस्सियों का एक कोड़ा बनाया और उन सबको भेड़ों और बैलों के साथ मन्दिर से बाहर निकाल दिया। सर्राफो के सिक्के बिखेर दिये और उनके मेज़ों को उलट दिया और कबूतर बेचने वालों से कहा इन्हें यहां से ले जाओ मेरे पिता के घर को व्यापार का घर मत बनाओ। (यूहन्ना 2:13-16 के अनुसार) व्यापारियों की धार्मिक अगुवों से सांठ-गांठ होती थी। वे दूर-दूर से आए हुए लोगों को बलिदान के पशु मनमानी क़ीमत पर बेचते थे। वे विदेशियों को मुद्राओं के बदले में मन्दिर की बराबर मुद्राएं देने के बजाय कम मुद्राएं देते थे। इस प्रकार के धोखे के व्यापार की धार्मिक अगुवों को पूर्ण जानकारी थी फिर भी वे अपने स्वार्थ के कारण उन पर कोई रोक नहीं लगाते थे, जिससे मन्दिर की पवित्रता एवं गरिमा कलुषित होती थी और आराधना में व्यवधान होता था। जब प्रभु यीशु मसीह ने इस प्रकार मन्दिर की सफाई की तो धार्मिक अगुवों ने उससे कटाक्ष भरे स्वर में पूछा कि ‘‘तू किस अधिकार से यह कार्य कर रहा है और किसने तुझे यह अधिकार दिया है?’’ उन्होंने सोचा होगा कि हर बार की तरह आज भी प्रभु यीशु मसीह कहेगा कि ये अधिकार उसे पिता परमेश्वर की ओर से मिला है। (यूहन्ना 5:19-27 के अनुसार), किन्तु आज उसने अगुवों से उल्टा प्रश्न किया कि यदि तुम मुझे बताओगे कि यूहन्ना का बपतिस्मा किसकी ओर से था, स्वर्ग की ओर से या मनुष्यों की ओर से? तो मैं भी तुम्हें बताऊंगा कि मैं किस अधिकार से ये काम करता हूं। उसके इस प्रश्न से धार्मिक अगुवे बड़ी दुविधा में पड़ गये कि यदि वे कहेंगे कि ‘‘स्वर्ग की ओर से’’ तो वह कहेगा कि तुमने उसका विश्वास क्यों नहीं किया और यदि वे कहेंगे कि ‘‘मनुष्यों की ओर से’’ तो भीड़ में बलवा हो जाएगा क्योंकि लोग यूहन्ना को नबी मानते थे। तब उन्होंने यीशु के प्रश्न का उत्तर टालने की मनसा से चालाकी से कहा ‘‘हम नहीं जानते।’’ तब यीशु ने भी उनसे कहा कि मैं भी तुम्हें यह नहीं बताऊंगा कि किस अधिकार से मैं यह कार्य करता हूं। इस घटना के बाद ही धार्मिक अगुवों की सतही एवं दिखावटी धार्मिकता का खुलासा करने के लिए प्रभु यीशु मसीह ने दो पुत्रों का दृष्टान्त सुनाया। विषय वस्तुः- किसी मनुष्य के दो पुत्र थे। उसने पहले के पास जाकर कहा; हे पुत्र, आज दाख की बारी में काम कर, इस पुत्र ने लापरवाही से पिता की आज्ञा को अनादर पूर्वक स्पष्ट शब्दों में कहकर टाल दिया कि मैं नहीं जाऊंगा किन्तु बाद में उसे अपनी ग़लती का अहसास हुआ। उसे लगा कि उसने पिता की आज्ञा का उल्लघंन कर उसका दिल दुःखाया है और जो ज़िम्मेदारी पिता ने उसे सौंपी थी, उसे पूरा नहीं किया है। ये सोचकर उसे पश्चाताप हुआ और पिता की आज्ञानुसार वह दाख की बारी में काम करने के लिए गया। पिता ने ऐसे ही दूसरे पुत्र के पास जाकर कहा। इस दूसरे पुत्र ने ध्यान से पिता की आज्ञा सुनी। बड़े आदरपूर्वक उसे आज्ञापालन का वचन दिया किन्तु फिर उसने पिता की भावनाओं की कोई कद्र नहीं की। उसने पिता को दिया हुआ वचन भी नहीं पूरा किया और दाख की बारी में काम करने नहीं गया। प्रभु यीशु मसीह ने यह दृष्टान्त सुनाकर धार्मिक अगुवों से ही यह प्रश्न किया कि इन दोनों में से किस बेटे ने पिता की इच्छा पूरी की? धार्मिक अगुवों ने उत्तर दिया कि पहले ने। व्याख्याः- दृष्टान्त में पहले पुत्र के द्वारा प्रभु यीशु मसीह ने ग़ैर यहूदियों, अन्य जातियों, महसूल लेने वालों और वेश्याओं की स्थिति प्रगट की जिन्होंने पहले तो परमेश्वर पिता की आज्ञाओं को लापरवाही पूर्वक टाल कर उसका दिल दुःखाया था किन्तु, फिर उन्होंने यूहन्ना एवं यीशु के प्रचार को सुना और अपने पापों से पश्चाताप किया, परमेश्वर को अपने हृदय में स्थान दिया और उसकी शिक्षाओं के अनुसार स्वयं को परिवर्तित किया। इस्राएली जाति परमेश्वर की चुनी हुई प्रजा थी। उन्होंने परमेश्वर के पीछे चलने का प्रण तो किया था किन्तु वे बार-बार परमेश्वर से दूर हो जाते थे। वे परमेश्वर की आज्ञाओं को तोड़कर मनुष्यों द्वारा ठहराई हुई विधियों एवं रीति-रिवाजों को ही पूरा करने में लगे रहते थे। वे प्रगट रूप से ऐसा करते थे मानो वे वास्तव में मसीह की बाट जोह रहे हों किन्तु अनेकों ठोस तथ्यों एवं प्रमाणों के बावजूद वे मसीह को सामने देखकर भी उसको सम्मान पूर्वक ग्रहण करने के बदले उसका इन्कार करते थे। वे बाह्य रूप से तो स्वयं को बहुत धर्मी दिखाते थे परन्तु उन्होंने हृदय से पश्चाताप किया ही नहीं था और न ही अपने हृदय में परमेश्वर को स्थान दिया था। उनके लिए प्रभु यीशु मसीह ने मत्ती 23:27-28 में कहा कि ‘‘तुम चूना फिरी हुई क़ब्रों के समान हो जो ऊपर से तो सुन्दर दिखाई देती हैं परन्तु भीतर मुर्दों की हड्डियों और सब प्रकार की मलिनता से भरी हैं। इसी रीति से तुम भी ऊपर से मनुष्यों को धर्मी दिखाई देते हो परन्तु भीतर कपट और अधर्म से भरे हुए हो।’’ यह दृष्टान्त सुनाकर प्रभु यीशु मसीह ने धार्मिक अगुवों से प्रश्न किया कि इन दोनों पुत्रों में से किसने पिता की इच्छा पूरी की? वे अच्छी तरह समझ गये थे कि प्रभु यीशु मसीह ने उनकी ही ओर इशारा किया है, अतः वे उसके प्रश्न का उत्तर नहीं देना चाहते थे। परन्तु अन्ततः उन्हें प्रश्न का उत्तर देना ही पड़ा, स्वयं अपने ही होठों से अपनी आलोचना करनी पड़ी और उन्हें अपनी वास्तविक स्थिति स्वीकार करनी पड़ी। व्यवहारिक पक्ष एवं आत्मिक शिक्षाः- 1. परमेश्वर के पीछे चलने का निर्णय कर लेना ही पर्याप्त नहीं बल्कि उसे व्यवहारिक रूप में अपने जीवन के हर पहलू एवं हर आयाम में जीना है और प्रकट करना है। 2. हमें वचन को मात्र सुनना नहीं है बल्कि उस पर चलना भी है क्योंकि मात्र सुनने वाले अपने आप को धोखा देते हैं। (याकूब 1:22 के अनुसार) 3. दिखावटी धार्मिक कर्म-काण्डों से, रीति-रिवाजों को पूरा कर लेने से स्वयं को धर्मी समझने की ग़लतफ़हमी में नहीं पड़ना है, क्योंकि परमेश्वर हृदय को जांचता है। (भजन संहिता 7:9) सच्चे पश्चताप और विश्वास के द्वारा ही हम परमेश्वर को अपने हृदयों में स्थान दे सकते हैं। स्वयं के लेखे में धर्मियों का परमेश्वर के राज्य में कोई स्थान नहीं। डॉ. श्रीमती इन्दु लाल
|
|||
| Last Updated on Thursday, 20 March 2008 18:36 |



