दैनिक मनन

  • मसीही नाम के, या काम के
    मसीही नाम के, या काम के ‘‘उसने (यीशु ने) सबसे कहा, यदि कोई मेरे पीछे आना चाहे, तो अपने आप से इन्‍कार करे और प्रतिदिन अपना क्रूस उठाये हुए मेरे पीछे हो ले’’। (लूका 9:23-25)मैंने प्रचार कार्य के लिए कई...

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विवाह के भोज का दृष्‍टान्‍त PDF Print E-mail
Written by डॉ. श्रीमती इन्‍दु लाल   
Tuesday, 12 September 2006 16:54

संदर्भः मत्‍ती 22:1-4, लूका 14:15-24 पृष्‍ठभूमि एवं प्रस्‍तावनाः- मत्‍ती में यह दृष्‍टान्‍त प्रभु यीशु मसीह ने अपनी मृत्‍यु के कुछ दिन पूर्व कहा और लूका में सब्‍त के दिन भोज के उपरान्‍त यह दृष्‍टान्‍त कहा।

धार्मिक अगुवे निरन्‍तर प्रयासरत थे कि किस प्रकार वे छल से यीशु को अपने कुचक्र में फंसा लें और उसका अन्‍त कर दें। यीशु को उनके इस कपट का पूर्ण एहसास था। ऐसी परिस्थिति में उसने धार्मिक अगुवों शास्त्रि‍यों और फ़रीसियों की ओर इशारा करते हुए यह दृष्‍टान्‍त सुनाया।

विषयवस्‍तु सारांशः राजा ने अपने पुत्र के विवाह के उपलक्ष्‍य में राजकीय भोज का आयोजन किया। उसने राज्‍य के सभी सभ्रान्‍त एवं सम्‍माननीय लोगों को आमंत्रि‍त किया। भोज के दिन राजा ने अपने सेवकों को भेजकर सभी आमंत्रि‍तों को पुनः सूचित किया कि वे भोज में निश्चित रूप से सम्मिलित हों। इन सभो ने राजा के आमंत्रण को बड़े बेतुके कारण बताकर लापरवाही से टाल दिया। इतना ही नहीं उन्‍होंने राजा के सेवकों के साथ दुर्व्‍यवहार किया और बहुतों को मार भी डाला। राजा उनके इस अपमान से अत्‍यन्‍त क्रोधित हुआ और अपनी सेना भेजकर उन हत्‍यारों को नाश किया। इसके बाद राजा ने अपने सेवकों को भेजकर राज्‍य के सभी सामाजिक, आर्थिक, नैतिक रूप से पतित एवं तुच्‍छ गिने जाने वाले लोगों को भोज के लिए आमंत्रि‍त किया। और उन्‍हें ऐसे वस्‍त्र पहनने को दिये जिससे उनकी दयनीय स्थिति राजवस्‍त्रों से प्रगट ना हो। इनमें एक व्‍यक्ति ने राजवस्‍त्र पहनने से इन्‍कार किया और राजा के क्रोध और अनन्‍त दण्‍ड का भागीदार हुआ।

अनुवादः
इस दृष्‍टान्‍त में – राजा – परमेश्‍वर
पुत्र – प्रभु यीशु मसीह के सभी गवाह
नेवताहारी – तथाकथित मसीही
जेवनहारी – अन्‍य जाति जिन्‍होंने प्रभु यीशु मसीह को अपना उद्धारकर्ता स्‍वीकार किया है।
ब्‍याह का वस्‍त्र – पवित्रता का प्रतीक।
जिसने ब्‍याह का वस्‍त्र नहीं पहना- ऐसे लोग जो स्‍वयं को इतना धार्मिक समझते हैं कि उन्‍हें स्‍वर्ग राज्‍य में प्रवेश के लिए पश्‍चाताप की और प्रभु यीशु मसीह के बलिदान की कोई आवश्‍यकता नहीं।
इस दृष्‍टान्‍त में प्रभु यीशु मसीह ने सर्वप्रथम उन तथाकथित मसीही अगुवों एवं मसीहियों की ओर इशारा किया जो इस भ्रम में है कि स्‍वर्ग राज्‍य में प्रवेश उनका जन्‍मसिद्ध अधिकार है। हृदय में ना उन्‍होंने प्रभु यीशु को स्‍थान दिया है और ना ही उनको पश्‍चाताप हुआ है। वे अपनी सामाजिक प्रतिष्‍ठा, पद, व्‍यसाय एवं धन के नशे में ही मशगूल हैं। परमेश्‍वर का स्‍थान इन सांसारिक चीज़ों ने ले लिया है। परमेश्‍वर के भक्‍तों के द्वारा किये जा रहे प्रचार का वे उपहास करते हैं। परमेश्‍वर के आमंत्रण को वे ठुकराते हैं। वे परमेश्‍वर से अपेक्षा करते हैं कि वह पहले उनकी पारिवारिक एवं व्‍यवसायिक ज़ि‍म्‍मेदारियों को समझे तब फिर बाद में वे अपनी सुविधानुसार परमेश्‍वर के आमंत्रण को स्‍वीकार करेंगे। मसीही इतिहास इस बात का प्रमाण है कि परमेश्‍वर के गवाहों को कुछ धर्म के ठेकेदारों ने किस प्रकार निर्ममता पूर्वक मौत के घाट तक उतार दिया।

ऐसे लोगों पर परमेश्‍वर का क्रोध भड़कता है और वो ऐसों का न्‍याय कर उन्‍हें दण्डित करता है। इस्राएलियों के हृदय की कठोरता के कारण प्रभु यीशु मसीह ने सामाजिक रूप से तिरस्‍कृत और नैतिक रूप से पतित लोगों के बीच प्रचार किया। बहुतेरे महसूल लेने वाले, पापी, डाकू, वेश्‍याएं, कंगाल, अंधे-बहरों आदि ने प्रभु यीशु पर विश्‍वास किया और उसे अपने हृदय में स्‍थान दिया।

परमेश्‍वर का आमंत्रण संसार के सभी वर्गों के लोगों के लिए है। प्रभु यीशु मसीह ने सम्‍पूर्ण मानव जाति के पापों की क्षमा के लिए अपने रक्‍त की कीमत अदा की। अब प्रभु यीशु पर विश्‍वास करने, उसे अपना मुक्तिदाता स्‍वीकार करने एवं उसकी आज्ञा पर चलने के द्वारा उद्धार प्रत्‍येक को उपलब्‍ध है। ऐसों को परमेश्‍वर धार्मिकता के वस्‍त्र पहनाता है, ये वस्‍त्र प्रगट करते हैं कि उन्‍होंने पश्‍चाताप किया है और उनके पाप प्रभु यीशु मसीह में क्षमा किये गये हैं।

इस दृष्‍टान्‍त के अन्तिम दृश्‍य में एक ऐसे मनुष्‍य का जिक्र है जो राजकीय भोज में राजा द्वारा प्रदान किये गये वस्‍त्र धारण किये बग़ैर शामिल हुआ। उसने राजकीय वस्‍त्र पहनने से इन्‍कार किया और राजा के क्रोध और अनन्‍त दण्‍ड का भागीदार हुआ। ये मनुष्‍य ऐसे लोगों को प्रगट करता है जो स्‍वयं को इतना धार्मिक समझते हैं कि, सोचते हैं कि उन्‍होंने ऐसा पाप ही नहीं किया कि उन्‍हें उसकी क्षमा के लिए पश्‍चाताप की तथा यीशु के पवित्र लहू की आवश्‍यकता हो। वे परमेश्‍वर के इस वचन को पूर्ण रूप से अनसुना कर देते हैं जहां लिखा है कि ‘‘और किसी दूसरे के द्वारा उद्धार नहीं क्‍योंकि स्‍वर्ग के नीचे मनुष्‍यों में और कोई दूसरा नाम नहीं दिया गया जिसके द्वारा हम उद्धार पा सकें।’’ (प्रेरितों के काम 4:12), साथ ही यह भी कि ‘‘जो पुत्र पर विश्‍वास करता है अनन्‍त जीवन उसका है परन्‍तु जो पुत्र को नहीं मानता वह जीवन को नहीं देखेगा परन्‍तु परमेश्‍वर का क्रोध उस पर रहता है।’’ (यूहन्‍ना 3:36) ऐसे स्‍वयं के लेखे अहंकारी धर्मियों का भी परमेश्‍वर न्‍याय करेगा और उन्‍हें दण्‍ड देगा।

व्‍यवहारिक पक्ष एवं आत्मिक शिक्षाः
1. परमेश्‍वर, कलीसिया के लोगों को बुलाता है कि पास्‍टरों प्रचारकों एवं अन्‍य दासों के द्वारा वे उसके वचन के प्रति आज्ञाकारी रहें। उसके अनुग्रह को तुच्‍छ ना जानें। हमें उसके आमंत्रण को स्‍वीकार करना है। अपने हृदयों में, जीवन में उसे सर्वप्रमुख स्‍थान देना है। व्‍यर्थ के बहानों से, सांसारिक प्रलोभनों से स्‍वयं को बचाना है।

2. प्रत्‍येक मसीही को उसकी गवाही देने के लिए जागृत होना है जिससे उसके पड़ोस, समाज, कस्‍बे, गांव, शहर और सम्‍पूर्ण भारत वर्ष में लोग प्रभु यीशु मसीह को एकमात्र उद्धारकर्ता करके स्‍वीकार कर सकें।

3. हमारे जीवन में सच्‍चा पश्‍चाताप होना आवश्‍यक है जिसका अर्थ है अपनी सभी बुराइयों को छोड़कर प्रभु यीशु मसीह की अच्‍छाइयों के साथ उसके वचन के प्रकाश में आगे वढ़ना।

इन बातों को ध्‍यान में रखकर ही हम परमेश्‍वर के स्‍वर्ग राज्‍य के भागीदार हो सकेंगे।

डॉ. श्रीमती इन्‍दु लाल

Last Updated on Thursday, 20 March 2008 18:37
 
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