| राष्ट्र की प्रगति और मसीही उत्तरदायित्व |
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| Written by श्री मिकाएल सोना | |||
| Tuesday, 12 September 2006 16:51 | |||
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राष्ट्र की प्रगति हर नागरिक का मूल उत्तरदायित्व है। वह उत्तरदायित्व अनिवार्य है ऐच्छिक Optional नहीं। अतः इसके विवेचन, मूल्याकंन एवं क्रियान्वयन की ओर एक नागरिक को पुर्नप्रेरित करना दूसरे नागरिक का पावन उत्तरदायित्व है। इस प्रकार उत्तरदायित्व-निर्वाह की यह श्रृंखला राष्ट्र-निर्माण में एक प्रमुख भूमिका निभाती है। मसीहियत का अस्तित्व भारत में प्रथम शताब्दी से ही है। भारत के विभिन्न धार्मिक विश्वासों में मसीहियत का एक प्रमुख स्थान रहा है। उदाहरणार्थः ‘‘हिन्दु, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई- भारतवासी भाई-भाई’’ का नारा वर्षों से लोकप्रिय होने के साथ-साथ राष्ट्रीय एकता व आह्वान है। अतः स्पष्ट है कि मसीहियत भारतीय राष्ट्रीय जीवन का एक अंग बन चुका है। शिक्षा, विज्ञान, चिकित्सा, समाज-सेवा, प्रशासन एवं राजनीतिक कोई भी ऐसा क्षेत्र बाकी नहीं रह गया है जहां मसीहियत का सक्रिय Involvement परिलक्षित न होता हो। भारत की प्रगति में मसीहियों ने जो भूमिका निभायी है यदि उसकी विस्तृत विवेचना की जाए तो अनेक पृष्ठों वाले कई ग्रन्थ भी लिखे जा सकते हैं। इसके बावजूद धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र होने के कारण भारत में मसीहियत के अस्तित्व का बना रहना निश्चय ही निर्विवाद सत्य बना रहेगा। भारत में मसीहियत बनी रहेगी और भारतीय मसीही भारतीय नागरिक बने रह कर अपने उत्तरदायित्वों का निर्वाह करते रहेंगे। आज जबकि भारत स्वतंत्र है। आइये हम अपने प्रिय देश की प्रगति हेतु तन-मन-धन से जुट जाने को कृत संकल्प हो जाएं और साथ ही आशा करें कि विगत वर्षों की भांति मसीहियों को समस्त विसंगतियों से परे भारत का अभिन्न अंग मान कर उन्हें एक मजबूत, स्वच्छ एवं संगठित समाज बने रह कर, राष्ट्र-निर्माण हेतु अपना सम्पूर्ण सहयोग प्रदान करने के स्वर्णिम अवसर मिलते रहेंगे। इसी में मसीहियत का कल्याण। इसी में राष्ट्र का कल्याण है। आईये हम सच्चे नागरिक बन कर राष्ट्र-निर्माण की प्रक्रिया में अधोलिखित सहयोग प्रदान करें – 1. परिवार समाज की मूल इकाई है। समाज देश की इकाई है। अतः अपने परिवार में सौहार्द्र एवं प्रेम की भावना से अपना जीवन निर्वाह करें। 2. उनके भागीदार हों। अपने उत्तम व्यवहार एवं सेवा का प्रदर्शन करें। 3. अपने गली-मुहल्ले में स्वच्छता एवं अनुशासन बनाए रखने हेतु प्रयासरत रहें। मुहल्ले की प्रगति हेतु आवश्यक सहयोग प्रदान करें। 4. अपने अंचल की समाजसेवी एवं शासकीय संस्था-समितियों की कल्याणकारी योजनाओं में से खुले हृदय से यथा-सम्भव सक्रिय भूमिका निभाएं। 5. असामाजिक तत्वों को पनपने से रोकें तथा उनके उन्मूलन में प्रशासन को सहयोग करें। 6. समय, जल, ऊर्जा, ईंधन, बिजली, एवं अन्य नैसर्गिक संसाधनों के अपव्यय को रोकें। व्यर्थ के दिखावों एवं शान - शौकत में किये जाने वाले अपव्ययों से बचें एवं मितव्ययी जीवन को प्रोत्साहित करें। 7. खाद्यान्न एवं अन्य उपभोक्ता सामग्रियों के अधिक उत्पादन में सहयोग दें। 8. पर्यावरण को स्वच्छ बनाए रखने हेतु वृक्ष लगाकर प्रदूषण रोकें। 9. यातायात के नियमों का पालन स्वयं करें एवं दूसरों को भी प्रेरणा दें। 10. सार्वजनिक एवं राष्ट्रीय सम्पत्ति की सुरक्षा करें। 11. अफवाहें न तो फैलाएं और न ही फैलने दें। 12. सामाजिक मर्यादाओं का आदर करते हुए उनके अनुपालन में स्वेच्छा से सहयोग दें तथा मर्यादा भंग करने वालों को ऐसा करने से हतोत्साहित करें। 13. साक्षरता-वृद्धि, जनचेतना-सृष्टि एवं जन-जागृति में सक्रिय भूमिका निभाएं। 14. अलगाववादी भावनाओं, उग्रवाद, आतंकवाद, संस्कृतिगत, जातिगत, धर्मगत, भाषागत एवं दलगत भेदभावों को आश्रय न देकर अहिंसा, प्रेम एवं एकता के मूल मानवीय गुणों से उत्प्रेरित होकर राष्ट्र की अखंडता को अक्षुण्ण बनाए रखने में सहयोग प्रदान करें। 15. राष्ट्र द्वारा घोषित विभिन्न विकास योजनाओं में यथा संभव सहयोग दें। करों, लगानों एवं शुल्कों का उचित समय पर नियमित रूप से भुगतान करें। 16. स्वस्छ एवं सुदृढ़ प्रशासन हेतु सुयोग्य, अनुभवी, एवं विचारवान उम्मीदवारों का ही निर्वाचन करें। 17. भ्रष्टता को पनपने न दें अर्थात् घूसखोरी, काला बाजारी, जमाखोरी, सिफारिश एवं राजनैतिक दबाव से स्वयं को मुक्त एवं निष्कलंक रखें। 18. अपनी समस्याओं एवं सार्वजनिक समस्याओं के निराकरण हेतु उचित सूचनाएं एवं जानकारियां संबंधित विभागों को अवश्य उपलब्ध कराते रहें। 19. राष्ट्रभाषा, राष्ट्रीय-गान, राष्ट्रीय ध्वज, राष्ट्रीय चिन्हों एवं राष्ट्रीय महापुरूषों का उचित सम्मान करें। स्वाधीनता दिवस एवं गणतंत्र दिवस एवं अन्य राष्ट्रीय अतिमहत्वपूर्ण दिवसों को उल्लासपूर्वक मनाएं। राष्ट्र की प्रगति हेतु प्राणोत्सर्ग करने हेतु प्रस्तुत करें। 20. राष्ट्र के सर्वोच्च पदाधिकारियों एवं प्रत्येक नागरिक के कल्याण एवं उनकी अनंत कालीन मुक्ति हेतु नित्य प्रार्थनारत रहकर उन तक प्रभु यीशु मसीह के अनुपम प्रेम का संदेश पहुंचाने को सर्वोच्च प्राथमिकता प्रदान करते हुए इस दिशा में निरन्तर प्रयत्नशील रहें। (1 तीमुथियुस 2:1-4) मिकाएल सोना, जगदीशपुर रायपुर (छ.ग.)
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| Last Updated on Thursday, 20 March 2008 15:21 |



